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दशगात्र से जुड़े सभी प्रश्न(17)

दशगात्र पर शास्त्रीय व्याख्या, विधि, नियम, मंत्र और लाभ — सब एक ही स्थान पर। कुल 17 प्रश्न उपलब्ध हैं।

लोक

किशोर मृत्यु का श्राद्ध कब करें?

अविवाहित किशोर मृत्यु का पितृ पक्ष श्राद्ध पंचमी को होता है।

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मरणोपरांत आत्मा यात्रा

13-दिनीय यात्रा आत्मा को कौन सी नई देह देती है?

13-दिनीय प्रक्रिया आत्मा को पिण्डदान से निर्मित पिण्डज शरीर देती है।

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मरणोपरांत आत्मा यात्रा

पिण्डदान आत्मा की सद्गति में कैसे सहायक है?

पिण्डदान पिण्डज शरीर बनाता है, प्रेत को तृप्त करता है और आत्मा को यममार्ग की यात्रा के योग्य बनाता है।

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मरणोपरांत आत्मा यात्रा

दसवें दिन अशुद्धि का कौन सा चरण समाप्त होता है?

दसवें दिन पिण्डज शरीर पूर्ण होने पर अशुद्धि का प्रारंभिक चरण समाप्त माना जाता है।

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मरणोपरांत आत्मा यात्रा

दशगात्र में दिए गए पिण्ड के कितने भाग होते हैं?

दशगात्र के पिण्ड के चार भाग होते हैं।

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मरणोपरांत आत्मा यात्रा

मृत्यु के बाद दस दिनों का पिण्डदान क्यों जरूरी है?

दस दिनों का पिण्डदान प्रेत का पिण्डज शरीर बनाता है और आत्मा को भटकने से बचाता है।

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मरणोपरांत आत्मा यात्रा

दशगात्र क्या होता है?

दशगात्र मृत्यु के बाद दस दिनों तक होने वाला पिण्डदान है, जिससे पिण्डज शरीर बनता है।

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मरणोपरांत आत्मा यात्रा

पिण्डदान से आत्मा का शरीर कैसे बनता है?

पिण्डदान के भागों से प्रेत के अंग बनते हैं, यमदूत संतुष्ट होते हैं और प्रेत को क्षुधा-शांति मिलती है।

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मरणोपरांत आत्मा यात्रा

पिण्डज शरीर कैसे बनता है?

पिण्डज शरीर दस दिनों के पिण्डदान से सिर से पैरों तक क्रमशः बनता है।

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मरणोपरांत आत्मा यात्रा

पिण्डज शरीर क्या होता है?

पिण्डज शरीर पिण्डदान से दस दिनों में बनने वाला प्रेत का पारलौकिक शरीर है।

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जीवन एवं मृत्यु

दशगात्र में किए गए कर्मों का क्रम क्या है?

दशगात्र क्रम — प्रतिदिन स्नान-संकल्प, घट-दीप-माला, पिंडदान (नाम-गोत्र सहित), चंदन-फूल, धूप-दीप-नैवेद्य-जलांजलि। ब्राह्मण को मिष्टान्न भोजन। अंत में विष्णु-प्रार्थना। दसवें दिन मुंडन।

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जीवन एवं मृत्यु

पिंडदान के प्रत्येक दिन का प्रेत पर क्या प्रभाव होता है?

दशगात्र में — प्रत्येक पिंड से एक-एक अंग बनता है (1=सिर, 2=ज्ञानेंद्रियाँ, 3=गर्दन, 4=छाती, 5=पीठ, 6=पेट, 7=कमर, 8=जाँघ, 9=पैर, 10=पूर्ण देह)। दसवें दिन 'हस्तमात्र' यातना-शरीर पूर्ण होता है।

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जीवन एवं मृत्यु

प्रेत को "यातनादेह" कब प्राप्त होता है?

यातनादेह दाह-संस्कार के बाद दशगात्र के दस पिंडों से क्रमशः दस दिनों में बनती है। 'दग्धे देहे पुनर्देहः पिण्डैरुत्पद्यते' — दसवें दिन 'हस्तमात्र' देह पूर्ण होती है। बिना पिंडदान के यह देह नहीं बनती।

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जीवन एवं मृत्यु

दशगात्र का प्रेत से क्या संबंध है?

दशगात्र और प्रेत का संबंध — दशगात्र के पिंड प्रेत का नया शरीर बनाते हैं, उसका भोजन हैं और यमयात्रा की शक्ति देते हैं। बिना दशगात्र के प्रेत शरीरहीन और असहाय रहता है।

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दशगात्र क्या है?

दशगात्र = दस दिनों के पिंडदान से प्रेत के दस अंगों का निर्माण। गरुड़ पुराण के ग्यारहवें अध्याय का विषय। 'हस्तमात्र' यातना-देह इसी से बनती है। यह पुत्र का अनिवार्य कर्तव्य है।

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जीवन एवं मृत्यु

मृत्यु के बाद दस दिन के कर्म क्यों किए जाते हैं?

मृत्यु के बाद दस दिन के कर्म इसलिए — प्रेत का यातना-शरीर बनाने के लिए (पिंडों से), यमयात्रा की शक्ति देने के लिए, भूख-प्यास की पीड़ा कम करने के लिए और आत्मा को गरुड़ पुराण के ज्ञान से मार्ग दिखाने के लिए।

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जीवन एवं मृत्यु

पिंडदान से प्रेत को शरीर कैसे मिलता है?

गरुड़ पुराण का श्लोक — 'दग्धे देहे पुनर्देहः पिण्डैरुत्पद्यते' — दस दिनों के दस पिंडों से 'हस्तमात्र' (एक हाथ बराबर) यातना-शरीर बनता है। प्रत्येक पिंड से एक-एक अंग का निर्माण होता है। इसी शरीर से जीव यमयात्रा करता है।

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