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विस्तृत उत्तर
दशगात्र मृत्यु के बाद प्रथम दस दिनों में किया जाने वाला पिण्डदान है। यह 13-दिनीय यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण वैधीकरण माना गया है। इन दस दिनों में प्रतिदिन दिए जाने वाले पिण्डों से प्रेत का पिण्डज शरीर क्रमशः बनता है। पहले दिन सिर, दूसरे दिन गर्दन और कंधे, तीसरे दिन हृदय और वक्षस्थल, चौथे दिन पीठ, पाँचवें दिन नाभि, छठे दिन कटि और गुह्यांग, सातवें दिन जांघें, आठवें दिन घुटने, नौवें दिन पैर और दसवें दिन पूर्ण देह बनती है।
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