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विस्तृत उत्तर
मृत्यु के बाद दस दिनों का पिण्डदान इसलिए जरूरी है क्योंकि इन्हीं पिण्डों से प्रेत का पिण्डज शरीर बनता है। यदि दस दिनों तक विधिपूर्वक पिण्डदान से प्रेत को तृप्त नहीं किया जाता, तो आत्मा भूख से व्याकुल होकर बिना अन्न-जल के अनंत काल तक आकाश में वायव्य रूप में भटकती रहती है। दशगात्र में प्रतिदिन दिया गया पिण्ड शरीर के अलग-अलग अंगों का निर्माण करता है और दसवें दिन पूर्ण देह बनती है। इसी नवीन देह से आत्मा यममार्ग के शुभ-अशुभ फलों और यातनाओं को अनुभव करती है।
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