विस्तृत उत्तर
गरुड़ पुराण में मृत्यु के बाद दस दिनों के कर्मों के महत्व और कारण का विस्तृत वर्णन है।
यातना-शरीर निर्माण — गरुड़ पुराण का सर्वप्रथम और सर्वप्रमुख कारण — 'दग्धे देहे पुनर्देहः पिण्डैरुत्पद्यते' — स्थूल शरीर जलने के बाद प्रेत को यमयात्रा के लिए एक देह चाहिए। दस दिनों के दस पिंडों से यह देह क्रमशः बनती है।
प्रेत को शक्ति देना — यमलोक की 86,000 योजन की दीर्घ यात्रा के लिए प्रेत को शक्ति चाहिए। गरुड़ पुराण में कहा गया है कि 'दशगात्र से लेकर वार्षिक श्राद्धपर्यन्त किया गया कर्म गया श्राद्ध का फल देता है।'
परिवार का कर्तव्य — अशौच काल में परिवार शुद्धि नहीं कर सकता, तब भी प्रेत के लिए ये कर्म किए जाते हैं। गरुड़ पुराण के ग्यारहवें अध्याय में कहा गया है — 'अशौच में भी प्रेत को यात्रा-श्रम-क्षुधा-तृष्णा निवारण के लिए जल-पिंडादि प्रदान किए जाते हैं।'
आत्मा का ज्ञान — गरुड़ पुराण की कथा इन्हीं तेरह दिनों में सुनाई जाती है। मृत आत्मा यह सुनकर अपनी स्थिति और मार्ग को समझती है।
कर्तव्य-पालन — पुत्र और परिजनों का यह सर्वोच्च धर्म है।





