विस्तृत उत्तर
गरुड़ पुराण के ग्यारहवें अध्याय का नाम ही 'दशगात्रविधिनिरुपण' है — इस अध्याय में दशगात्र की विधि और महत्व का विस्तृत वर्णन है।
शाब्दिक अर्थ — 'दश' = दस और 'गात्र' = शरीर या अंग। दशगात्र का अर्थ है — दस अंगों वाला शरीर, जो दस दिनों के पिंडदान से बनता है।
गरुड़ पुराण का श्लोक — 'दग्धेदेहे पुनर्देहेः पिण्डेरुत्पद्यते खग। हस्तमात्रः पुमान् येन पथि भुंक्ते शुभाशुभं॥' — जले शरीर के बाद पिंडों से 'हस्तमात्र' नई देह उत्पन्न होती है।
दस दिनों का क्रम — प्रत्येक दिन के पिंड से शरीर का एक-एक अंग बनता है। दसवें दिन पूर्ण शरीर तैयार होता है।
दशगात्र की विधि — गरुड़ पुराण के अनुसार दस दिनों तक एक ब्राह्मण को प्रतिदिन मिष्टान्न भोजन कराना चाहिए, प्रेत के लिए भगवान विष्णु की प्रार्थना करनी चाहिए और पिंडदान करना चाहिए।
महत्व — गरुड़ पुराण में कहा गया है — 'पिता का दशगात्रादि कर्म पुत्र को करना चाहिए।' यह पुत्र का सर्वोच्च कर्तव्य है। बिना दशगात्र के प्रेत यातना-शरीर से वंचित रहता है।





