विस्तृत उत्तर
गरुड़ पुराण के ग्यारहवें अध्याय 'दशगात्रविधिनिरुपण' में दशगात्र के कर्मों का क्रम विस्तार से बताया गया है।
दिन 1 से 9 — प्रत्येक दिन — प्रातः स्नान, शुद्धि और संकल्प। घट (मटका) में जल, दुग्ध, माला और दीप का अर्पण। कुश का आसन रखकर नाम-गोत्र उच्चारण करते हुए चावल या जौ-पीठी के पिंड का अर्पण। उशीर, चंदन और फूल का निवेदन। धूप-दीप, नैवेद्य और दक्षिणा का समर्पण। काकान्न (कौए का भोजन), दूध और जल से भरा पात्र और जलांजलि प्रदान करना।
दशमाह — दसवें दिन के पिंड से पूर्ण देह बनती है। इस दिन क्षौरकर्म (मुंडन) होता है।
दस दिनों तक ब्राह्मण-भोजन — गरुड़ पुराण में कहा गया है — 'दस दिन तक एक ब्राह्मण को प्रतिदिन मिष्टान्न भोजन कराना चाहिए।'
विष्णु-प्रार्थना — प्रतिदिन श्राद्ध के अंत में प्रेत की मुक्ति के लिए भगवान विष्णु से प्रार्थना — 'हे अविनाशी विष्णु! आप प्रेत को मोक्ष प्रदान करने वाले हो।'
गोग्रास — स्नान कर घर जाने के बाद गाय को ग्रास देने के बाद भोजन।





