विस्तृत उत्तर
गरुड़ पुराण के प्रथम अध्याय में पिंडदान से प्रेत-शरीर निर्माण की प्रक्रिया का अत्यंत विस्तृत और शास्त्रोक्त वर्णन है।
मूल श्लोक — गरुड़ पुराण में एक अत्यंत महत्वपूर्ण श्लोक है — 'दग्धे देहे पुनर्देहः पिण्डैरुत्पद्यते खग। हस्तमात्रः पुमान् येन पथि भुंक्ते शुभाशुभं॥' अर्थात् — 'हे गरुड़! जले हुए शरीर के बाद पिंडों से एक नई देह उत्पन्न होती है। हाथ के बराबर का वह पुरुष उससे पथ पर शुभ-अशुभ फल भोगता है।'
प्रत्येक पिंड से एक अंग — गरुड़ पुराण में बताया गया है कि दस दिनों में दिए गए दस पिंडों से प्रेत के सूक्ष्म शरीर के विभिन्न अंग बनते हैं — पहले दिन सिर, दूसरे दिन गर्दन, तीसरे दिन कंधे आदि। दसवें दिन पूर्ण शरीर बन जाता है।
शरीर का आकार — यह शरीर 'हस्तमात्र' — एक हाथ के बराबर है। यह स्थूल शरीर नहीं, किंतु पीड़ा और भोग का माध्यम है।
यात्रा की शक्ति — इसी शरीर से जीव यमलोक की दीर्घ यात्रा कर सकता है। बिना इस शरीर के वह असहाय होता है।
इस प्रकार पिंडदान शाब्दिक अर्थ में प्रेत को एक नया शरीर देने की क्रिया है।





