विस्तृत उत्तर
गरुड़ पुराण में दशगात्र और प्रेत का संबंध शरीर-निर्माण और यात्रा-सक्षमता के स्तर पर है।
दशगात्र = प्रेत का नया शरीर — गरुड़ पुराण का मूल कथन है — 'दग्धे देहे पुनर्देहः पिण्डैरुत्पद्यते' — दाह-संस्कार में जले शरीर के बाद दशगात्र के पिंडों से ही प्रेत का नया सूक्ष्म शरीर बनता है। यह शरीर न हो तो प्रेत शरीर-विहीन और असहाय है।
भोजन का संबंध — गरुड़ पुराण में कहा गया है — 'अशौच में भी प्रेत को क्षुधा-तृष्णा-ताप आदि निवारण के लिए जल, पिंडादि प्रदान किए जाते हैं।' दशगात्र के पिंड प्रेत का भोजन हैं।
यात्रा-सक्षमता — बिना दशगात्र के प्रेत यमलोक की यात्रा नहीं कर सकता। इस शरीर के बनने के बाद ही यात्रा संभव है।
पुत्र का कर्तव्य और प्रेत का अधिकार — गरुड़ पुराण में कहा गया है — 'ज्येष्ठ पुत्र को भूमि पर शयन, एकाहार तथा ब्रह्मचर्य धारण करके भक्ति भाव से दशगात्र और श्राद्ध विधान करना चाहिए।' यह प्रेत का अधिकार है जिसे पुत्र पूरा करता है।
इस प्रकार दशगात्र प्रेत की अस्तित्व-रक्षा और यात्रा-सक्षमता का आधार है।





