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प्रेत को "यातनादेह" कब प्राप्त होता है?

यातनादेह दाह-संस्कार के बाद दशगात्र के दस पिंडों से क्रमशः दस दिनों में बनती है।

संक्षिप्त उत्तर

यातनादेह दाह-संस्कार के बाद दशगात्र के दस पिंडों से क्रमशः दस दिनों में बनती है। 'दग्धे देहे पुनर्देहः पिण्डैरुत्पद्यते' — दसवें दिन 'हस्तमात्र' देह पूर्ण होती है। बिना पिंडदान के यह देह नहीं बनती।

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विस्तृत उत्तर

गरुड़ पुराण के प्रथम अध्याय में 'यातनादेह' की प्राप्ति का वर्णन अत्यंत स्पष्ट और विस्तृत है।

दाह-संस्कार के बाद — स्थूल शरीर जलने के बाद आत्मा शरीर-विहीन हो जाती है। उसे यमलोक की यात्रा करनी है परंतु उसके पास कोई शरीर नहीं। यही वह क्षण है जब यातनादेह की आवश्यकता पड़ती है।

पिंडदान के माध्यम से — गरुड़ पुराण का मूल श्लोक है — 'दग्धे देहे पुनर्देहः पिण्डैरुत्पद्यते खग। हस्तमात्रः पुमान् येन पथि भुंक्ते शुभाशुभं॥' — अर्थात् जले शरीर के बाद पिंडों से नई देह उत्पन्न होती है।

दस दिनों में क्रमशः — दशगात्र के दस पिंडों से यह देह धीरे-धीरे बनती है। प्रथम पिंड से सिर, द्वितीय से गर्दन, इस प्रकार क्रमशः दसवें पिंड तक पूर्ण शरीर तैयार होता है।

दसवें दिन पूर्ण — दसवें पिंड के बाद प्रेत का 'हस्तमात्र' (एक हाथ के बराबर) यातना-शरीर पूर्ण होता है। इसी शरीर से वह यमलोक की यात्रा और शुभाशुभ कर्मफल भोगता है।

पिंडदान न मिले तो — शरीर नहीं बनता और प्रेत शरीर-विहीन, असहाय अवस्था में भटकता रहता है।

उत्तर को थोड़ा और स्पष्ट करें

प्रेत को "यातनादेह" कब प्राप्त होता है को संदर्भ सहित समझें

प्रेत को "यातनादेह" कब प्राप्त होता है का सबसे सीधा सार यह है: यातनादेह दाह-संस्कार के बाद दशगात्र के दस पिंडों से क्रमशः दस दिनों में बनती है। 'दग्धे देहे पुनर्देहः पिण्डैरुत्पद्यते' — दसवें दिन 'हस्तमात्र' देह पूर्ण होती है। बिना...

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