विस्तृत उत्तर
गरुड़ पुराण के प्रथम और ग्यारहवें अध्याय में दशगात्र के प्रत्येक दिन के पिंड के प्रभाव का वर्णन है।
प्रथम दिन — पहले पिंड से प्रेत के सिर का निर्माण होता है।
द्वितीय दिन — दूसरे पिंड से आँखें, नाक और कान (ज्ञानेंद्रियाँ) बनती हैं।
तृतीय दिन — तीसरे पिंड से गर्दन और कंधों का निर्माण।
चतुर्थ दिन — चौथे पिंड से छाती का निर्माण।
पंचम दिन — पाँचवें पिंड से पीठ और पसलियाँ।
षष्ठ दिन — छठे पिंड से नाभि और पेट का भाग।
सप्तम दिन — सातवें पिंड से कमर और गुप्तांग।
अष्टम दिन — आठवें पिंड से जाँघें।
नवम दिन — नवें पिंड से घुटने और पैर।
दशम दिन — दसवें पिंड से पूर्ण शरीर तैयार होता है — भूख और प्यास से युक्त यातना-शरीर।
गरुड़ पुराण में कहा गया है — 'हस्तमात्रः पुमान् येन पथि भुंक्ते शुभाशुभं' — इस हाथ-भर के शरीर से जीव यमपथ पर शुभ-अशुभ फल भोगता है।





