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क्या है

अद्वैत क्या है?(14)

अद्वैत का अर्थअद्वैत क्या है?अद्वैत का महत्व
सरल उत्तर

अद्वैत वेदांत का सरल अर्थ है — ब्रह्म ही एकमात्र परम सत्य है, यह जगत माया के कारण भिन्न प्रतीत होता है पर वास्तव में अभिन्न है, और जीव ब्रह्म से अलग नहीं बल्कि ब्रह्म ही है। जब यह ज्ञान होता है तो मोक्ष मिलता है।

स्रोत प्रश्न: अद्वैत वेदांत का सरल अर्थ क्या है? →
भगवद गीता

गीता में ज्ञान योग क्या है?

ज्ञान योग = आत्मा-ब्रह्म के यथार्थ बोध से मोक्ष। विचारकों के लिए। स्थितप्रज्ञ अवस्था — कामना-भय-क्रोध से मुक्त। क्षेत्र (शरीर) और क्षेत्रज्ञ (आत्मा) का विवेक (अध्याय 13)। 'सर्वकर्म ज्ञान में परिसमाप्त होते हैं' (4)। समदर्शिता — सभी में ईश्वर दर्शन।

#ज्ञान योग#गीता#आत्मज्ञान
लोक

सोहम मंत्र क्या है

सोहम मंत्र का अर्थ है वह परमात्मा मैं ही हूँ।

#सोहम मंत्र#हंस मंत्र#योग
लोक

हंस अवतार ने आप कौन हैं प्रश्न का क्या उत्तर दिया

भगवान हंस ने कहा कि आत्मा के स्तर पर मैं और तुम का भेद मिथ्या है।

#आप कौन हैं#हंस गीता#अद्वैत
लोक

अहमेवासमेवाग्रे का सरल अर्थ क्या है?

सृष्टि से पहले, बीच और अंत में केवल भगवान ही सत्य हैं।

#अहमेवासमेवाग्रे#चतुःश्लोकी#अद्वैत
लोक

सत्यलोक के निवासियों की करुणा का दार्शनिक अर्थ क्या है?

सत्यलोक की करुणा अद्वैत ज्ञान से उत्पन्न है — जब जीव समस्त प्राणियों में स्वयं को देखता है तो उनकी पीड़ा उसकी अपनी पीड़ा बन जाती है। यह 'सर्वम् ब्रह्म' की अनुभूति है।

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दक्षिणामूर्ति साधना

ज्ञान मुद्रा का मतलब क्या है?

तर्जनी और अंगूठे का मिलन जीवात्मा और परमात्मा के एक होने का प्रतीक है जिसे ज्ञान मुद्रा कहते हैं।

#ज्ञान मुद्रा#चिन-मुद्रा#अद्वैत
वेद एवं उपनिषद

अद्वैत वेदांत का सरल अर्थ क्या है?

अद्वैत वेदांत का सरल अर्थ है — ब्रह्म ही एकमात्र परम सत्य है, यह जगत माया के कारण भिन्न प्रतीत होता है पर वास्तव में अभिन्न है, और जीव ब्रह्म से अलग नहीं बल्कि ब्रह्म ही है। जब यह ज्ञान होता है तो मोक्ष मिलता है।

#अद्वैत#शंकराचार्य#वेदांत
तंत्र रहस्य

तंत्र साधना का रहस्य क्या है?

तंत्र के रहस्य: (1) जीवन का पूर्ण स्वीकार — दमन नहीं, रूपांतरण; (2) शिव और शक्ति एक हैं; (3) 'देवो भूत्वा देवं यजेत्' — साधक स्वयं देवता है; (4) मंत्र-साधक-देवता एक होना ही सिद्धि है; (5) परम रहस्य: 'शिवोऽहम्' — मैं ही शिव हूँ।

#तंत्र रहस्य#अद्वैत#शिवोऽहम्
उपनिषद परिचय

उपनिषद क्या हैं?

उपनिषद वेदों का दार्शनिक भाग है — गुरु के निकट बैठकर प्राप्त रहस्य ज्ञान। 108 उपनिषद हैं, 10 प्रमुख हैं। चार महावाक्य: 'प्रज्ञानं ब्रह्म', 'अहं ब्रह्मास्मि', 'तत्त्वमसि', 'अयमात्मा ब्रह्म'। सार: आत्मा और परमात्मा एक हैं — यही वेदांत का केंद्रीय सत्य है।

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शिव स्वरूप

शिव जी का अर्धनारीश्वर रूप क्या है?

अर्धनारीश्वर में शिव का आधा शरीर शिव (पुरुष/चेतना) और आधा पार्वती (स्त्री/शक्ति) का है। यह पुरुष-प्रकृति का अभेद और अद्वैत का प्रतीक है — सृष्टि के लिए दोनों तत्व अनिवार्य हैं।

#अर्धनारीश्वर#शिव-पार्वती#अद्वैत
शास्त्र ज्ञान

उपनिषद में परम सत्य क्या है?

उपनिषदों में परम सत्य ब्रह्म है — 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' (तैत्तिरीय 2/1)। 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' — यह सम्पूर्ण जगत ब्रह्म है (छान्दोग्य 3/14/1)। 'नेति नेति' — परम सत्य किसी परिभाषा में नहीं बंधता। 'तत्त्वमसि' — वह परम सत्य तू ही है — यह उपनिषदों का सर्वोच्च उद्घोष है।

#परम सत्य#उपनिषद#ब्रह्म
शास्त्र ज्ञान

उपनिषद में ब्रह्म ज्ञान क्या है?

उपनिषदों में ब्रह्मज्ञान 'अपरोक्षानुभूति' है — आत्मा और ब्रह्म की एकता का प्रत्यक्ष अनुभव। चार महावाक्य — 'अहं ब्रह्मास्मि', 'तत्त्वमसि', 'प्रज्ञानं ब्रह्म', 'अयमात्मा ब्रह्म' — इसके बीज हैं। मुण्डकोपनिषद (2/2/8) — ब्रह्मज्ञान से हृदय-ग्रंथि टूटती है और मोक्ष मिलता है।

#ब्रह्मज्ञान#उपनिषद#महावाक्य
दर्शन

तत्त्वमसि का अर्थ क्या है?

तत्त्वमसि = 'वह (ब्रह्म) तू ही है।' छांदोग्य उपनिषद (6.8.7) — गुरु उद्दालक ने श्वेतकेतु को उपदेश दिया। नमक-पानी का उदाहरण: ब्रह्म सबमें व्याप्त पर दिखता नहीं। चार महावाक्यों में से एक, अद्वैत वेदांत का मूल।

#तत्त्वमसि#महावाक्य#छांदोग्य उपनिषद
दर्शन

माया क्या है शंकराचार्य के अनुसार?

माया = वह शक्ति जिससे एक ब्रह्म अनेक (जगत) दिखता है। न सत् न असत् — 'अनिर्वचनीय।' दो शक्तियाँ: आवरण (सत्य ढकना) और विक्षेप (भ्रम दिखाना)। जादूगर का जादू जैसी — ब्रह्म अप्रभावित। ब्रह्मज्ञान से माया नष्ट = मोक्ष।

#माया#शंकराचार्य#अद्वैत
और क्या है
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