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गुरुवार (बृहस्पतिवार) व्रत कथा: संपूर्ण पारंपरिक एवं प्रामाणिक पाठ

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गुरुवार (बृहस्पतिवार) व्रत की संपूर्ण एवं पारंपरिक व्रत कथा

1. कथा का पारंपरिक प्रारंभ

सनातन हिंदू धर्म में देवगुरु बृहस्पति एवं भगवान श्री हरि विष्णु की कृपा प्राप्त करने हेतु गुरुवार (बृहस्पतिवार) के व्रत का विशेष महत्व है। पारंपरिक विधान के अनुसार, गुरुवार के दिन व्रत रखकर, केले के वृक्ष की पूजा करने के पश्चात् इस पावन व्रत कथा का वाचन एवं श्रवण किया जाता है ।

कथा किस संदर्भ में सुनाई जाती है: जब श्रद्धालु प्रातःकाल उठकर स्नानादि नित्य कर्मों से निवृत्त होकर पीले वस्त्र धारण करते हैं, और केले के वृक्ष के समीप अथवा भगवान विष्णु की प्रतिमा के सम्मुख बैठकर, पीले पुष्प, पीला चंदन, चने की दाल और मुनक्का (अथवा गुड़) अर्पित करते हैं, तब पूर्ण श्रद्धा और भक्ति-भाव से इस कथा का आरंभ होता है । कथा-श्रवण का पारंपरिक प्रसंग यह है कि कथा सुनते समय उपासक के हाथ में चने की दाल और गुड़ होना चाहिए, मन एकाग्र होना चाहिए, और कथा के मध्य में न तो किसी से बात करनी चाहिए और न ही अपने स्थान से उठना चाहिए ।

पारंपरिक आरंभिक वाक्य: "श्री गणेशाय नमः। श्री गुरुवे नमः। श्री लक्ष्मीनारायणाय नमः। एक समय की बात है, नैमिषारण्य तीर्थ में शौनकादि ऋषियों ने सूत जी से पूछा कि हे महामुने! कलिकाल में प्राणियों के उद्धार और मनोवांछित फल की प्राप्ति हेतु कौन सा व्रत सर्वश्रेष्ठ है? तब सूत जी ने देवगुरु बृहस्पति की इस परम कल्याणकारी कथा का वर्णन किया... " ।

इस संपूर्ण पारंपरिक व्रत-कथा में मुख्य रूप से भगवान बृहस्पति देव के चमत्कार और व्रत के प्रभाव को दर्शाने वाले भिन्न-भिन्न प्रसंग संकलित हैं, जिन्हें पारंपरिक पाठ के अनुसार शृंखलाबद्ध रूप में नीचे प्रस्तुत किया गया है。

कथा का संस्करण / प्रसंग मुख्य पात्र कथा का मूल संदेश / घटना
प्रथम प्रसंग प्रतापी राजा, अहंकारी रानी और दासी दान-पुण्य से विमुखता, देवगुरु का अपमान और धन-वैभव का नाश ।
द्वितीय प्रसंग रानी की बहन और दासी व्रत-श्रवण के नियम, भगवान की कृपा से अन्न की प्राप्ति और व्रत का संकल्प ।
तृतीय प्रसंग लकड़हारा (वन-वास में राजा) और साधु देवगुरु का साधु रूप में दर्शन, भूल का पश्चाताप और व्रत का उपदेश ।
चतुर्थ प्रसंग निर्धन ब्राह्मण और उसकी धार्मिक कन्या जौ के दानों का स्वर्ण में बदलना, स्वर्ण सूप की प्राप्ति और राजघराने में विवाह ।
पंचम प्रसंग राजा, शव (मुर्दा) और किसान मार्ग में कथा सुनाने का नियम, शव का जीवित होना और बैलों का पुनः उठना ।
षष्ठ प्रसंग सेठ और सेठानी (लोक-प्रचलित) सेठानी का व्रत, भगवान विष्णु द्वारा हाथ पकड़ना और साक्षात् दर्शन देना ।

2. मुख्य कथा: प्रथम संस्करण (राजा, रानी और दासी का प्रसंग)

राजा का धर्म-कर्म और रानी का अहंकार

प्राचीन काल की बात है, भारतवर्ष में एक अत्यंत प्रतापी, दानी और धर्मात्मा राजा राज्य करता था । राजा के राज्य में प्रजा अत्यंत सुखी थी। वह राजा नित्य प्रातःकाल उठकर भगवान का स्मरण करता, मंदिर जाता और गरीबों, असहायों तथा ब्राह्मणों की सहायता करता था । वह प्रत्येक गुरुवार को व्रत रखता और भगवान बृहस्पति देव का विधि-विधान से पूजन करता था । राजा के राजमहल के द्वार से कभी कोई याचक खाली हाथ या निराश होकर नहीं लौटता था。

परंतु, उस धर्मात्मा राजा की रानी की प्रवृत्ति राजा से बिल्कुल विपरीत थी। रानी को ये सब धर्म-कर्म, दान-पुण्य और व्रत-उपवास तनिक भी अच्छे नहीं लगते थे । वह अत्यंत कृपण (कंजूस) और अंहकारी थी। उसे न तो भगवान के पूजन में कोई रुचि थी और न ही दान देने में । वह कभी किसी ब्राह्मण या निर्धन को एक कौड़ी भी दान में नहीं देती थी और अपने पति (राजा) को भी सदैव धन लुटाने और दान देने से मना किया करती थी ।

साधु रूप में बृहस्पति देव का आगमन और रानी का नियम-भंग का वरदान मांगना

एक दिन की बात है, राजा अपने सैनिकों के साथ शिकार खेलने के लिए घने वन की ओर गए हुए थे और रानी राजमहल में अकेली थी । उसी समय स्वयं देवगुरु बृहस्पति रानी के अंहकार को तोड़ने और उसे सन्मार्ग पर लाने के लिए एक साधारण साधु का वेष धारण करके राजा के महल के द्वार पर भिक्षा मांगने के लिए आए ।

साधु ने जब रानी से भिक्षा मांगी, तो रानी ने भिक्षा देने से स्पष्ट इंकार कर दिया। रानी ने अत्यंत क्रोधित और झुंझलाए हुए स्वर में साधु से कहा, "हे साधु महाराज! मैं तो इस नित्य के दान-पुण्य से अत्यंत तंग आ गई हूँ। मेरा पति दिन-रात खजाने से धन लुटाता रहता है । इसके लिए तो मेरे पति ही काफी हैं। मुझे इस अपार धन-संपत्ति से अब छुटकारा चाहिए। आप तो कोई सिद्ध महात्मा प्रतीत होते हैं, अतः आप मुझे कोई ऐसा उपाय बताएं जिससे हमारा यह सारा धन नष्ट हो जाए, यह खजाना खाली हो जाए और मैं शांति व चैन से अपना जीवन व्यतीत कर सकूँ ।"

रानी के ऐसे मूर्खतापूर्ण और कठोर वचन सुनकर साधु रूपी बृहस्पति देव ने उसे समझाते हुए अत्यंत शांत भाव से कहा, "हे देवी! तुम यह कैसी विचित्र बात कर रही हो? इस संसार में धन से कौन दुखी होता है? जिसके पास धन है, उसे तो इस धन का सदुपयोग करते हुए शुभ कर्म करने चाहिए । इस धन से तुम भूखे मनुष्यों को भोजन कराओ, राहगीरों के लिए प्याऊ लगवाओ, ब्राह्मणों को दान दो, कुएं, तालाब और बावड़ी आदि का निर्माण करवाओ, मंदिर और पाठशालाएं बनवाकर ज्ञान दान दो, धर्मशालाएं बनवाओ और निर्धन कुंवारी कन्याओं का विवाह करवाओ । ऐसे पुण्य कार्यों में धन को खर्च करो, जिससे इस लोक में तुम्हारे कुल का यश बढ़े और मृत्यु के उपरांत परलोक में सद्गति तथा स्वर्ग प्राप्त हो । धन नष्ट करने की बात सोचना महापाप है।"

परंतु साधु के इन अनमोल और ज्ञानपूर्ण उपदेशों का उस अंहकारी रानी के मन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। उसने अपनी ज़िद पकड़े रखी और हठपूर्वक बोली, "हे महाराज! मुझे ऐसे धन की कोई आवश्यकता नहीं है जिसे मुझे दूसरों को दान में देना पड़े और जिसे संभालने तथा सहेजने में ही मेरा सारा मूल्यवान समय नष्ट हो जाए । आप मुझे कोई उपदेश न दें, केवल धन नष्ट करने का अचूक उपाय बताएं।"

रानी के इस घोर अज्ञान और हठ को देखकर साधु रूपी देवगुरु ने कहा, "हे रानी! यदि तुम्हारी यही इच्छा है कि तुम्हारा सारा धन-वैभव नष्ट हो जाए, तो तुम ऐसा करना— बृहस्पतिवार (गुरुवार) के दिन तुम अपने पूरे घर के आंगन और फर्श को गोबर से लीपना। तुम अपने केशों (बालों) को पीली मिट्टी से धोना और बाल धोते समय ही स्नान करना । अपने पति राजा से कहना कि वह बृहस्पतिवार के दिन ही अपनी दाढ़ी बनवाए और हजामत करे । उस पवित्र दिन तुम अपने भोजन में मांस और मदिरा का भरपूर सेवन करना । इतना ही नहीं, अपने महल के सभी पहनने के कपड़े बृहस्पतिवार के दिन ही धोबी को धोने के लिए दे देना । यदि तुम लगातार ऐसा करोगी, तो मेरी बात सत्य जानना कि केवल सात बृहस्पतिवार के भीतर ही तुम्हारा सारा धन, संपत्ति और वैभव जड़ से नष्ट हो जाएगा ।"

यह श्राप रूपी उपाय बताकर साधु महाराज वहीं से अंतर्ध्यान हो गए ।

संकट की उत्पत्ति और घोर दरिद्रता का आगमन

साधु के जाने के पश्चात, रानी ने अगले ही बृहस्पतिवार से साधु के बताए अनुसार ही कार्य करना प्रारंभ कर दिया। उसने घर लीपा, बाल धोए, मांस-मदिरा का सेवन किया और कपड़े धोबी को दिए। अभी रानी को इस प्रकार नियम-भंग करते हुए और पाप कर्म करते हुए केवल तीन ही बृहस्पतिवार बीते थे कि उसका सारा धन, संपत्ति, सुख और वैभव नष्ट हो गया ।

राजकोष खाली हो गया, खजाने लुट गए और राज्य पर संकट आ गया। स्थिति यहाँ तक पहुँच गई कि राजा और रानी के पास अन्न का एक दाना भी नहीं बचा। संपूर्ण परिवार को दोनों समय भोजन के लाले पड़ गए और वे दाने-दाने को तरसने लगे । सांसारिक भोग और सुख-सुविधाएं तो दूर, उन्हें जीवन निर्वाह करना भी कठिन हो गया。

अपने ही राज्य में इस प्रकार की घोर दरिद्रता, भूख और अपमान को सहन न कर पाने के कारण, राजा ने अत्यंत दुखी मन से निर्णय लिया कि वह अब इस राज्य में नहीं रहेगा और परदेस जाकर कोई काम करेगा । राजा ने रानी से विदा ली और एक दूसरे देश (परदेस) में चला गया। वहां जाकर राजा ने जंगल से लकड़ियां काटना शुरू किया। वह प्रतिदिन लकड़ियां काटकर लाता और उन्हें शहर में बेचकर किसी प्रकार अपना अत्यंत दुखभरा जीवन व्यतीत करने लगा ।

पश्चाताप, दासी की यात्रा और पुनः व्रत-पालन

इधर अपने महल में रानी और उसकी एक वफादार दासी दोनों भूख से व्याकुल होकर अत्यंत दुखी रहने लगीं। उन्हें किसी दिन भोजन मिलता और किसी दिन वे केवल जल पीकर ही रात गुजार लेती थीं । जब इस प्रकार कष्ट सहते-सहते सात दिन व्यतीत हो गए और उन्हें अन्न का एक दाना भी प्राप्त नहीं हुआ, तब भूख से तड़पती हुई रानी ने अपनी दासी से कहा, "हे दासी! इस प्रकार तो हम भूखे ही प्राण त्याग देंगे। पास ही के नगर में मेरी एक सगी बहन रहती है, जो बहुत धनवान है। तुम उसके पास जाओ और वहां से किसी प्रकार पांच सेर बेझर (मोटा अनाज) मांग लाओ, जिससे हमारा कुछ समय के लिए गुजारा हो सके ।"

रानी की आज्ञा मानकर दासी उसकी बहन के पास गई। जिस समय दासी रानी की बहन के महल में पहुंची, उस समय बृहस्पतिवार का दिन था और रानी की बहन पूर्ण श्रद्धा के साथ बृहस्पतिवार की व्रत कथा सुन रही थी ।

दासी ने रानी की बहन के पास जाकर दीन स्वर में कहा, "हे रानी! मुझे तुम्हारी बहन ने भेजा है। हम कई दिनों से भूखे हैं, कृपया मुझे पांच सेर बेझर दे दो ।"

परंतु, देवगुरु बृहस्पति की व्रत कथा का यह कठोर नियम है कि कथा सुनते समय न तो अपने स्थान से उठा जाता है और न ही किसी से कुछ बोला जाता है। इसी नियम के कारण, रानी की बहन ने दासी की बात का कोई उत्तर नहीं दिया और चुपचाप ध्यानमग्न होकर कथा सुनती रही ।

जब दासी को कोई उत्तर मिला, तो वह बहुत दुखी हुई और उसे अत्यंत क्रोध भी आया। उसने लौटकर रानी को सब बात बता दी कि उसकी बहन ने उसे अपमानित किया है, उसकी ओर देखा तक नहीं और कोई उत्तर नहीं दिया । अपनी सगी बहन के इस व्यवहार को सुनकर रानी अत्यंत निराश हुई और रोते हुए कहने लगी, "हे दासी! इसमें उसका कोई दोष नहीं है। यह सब मेरे ही पाप कर्मों का फल है। भगवान जो चाहे करेंगे, भाग्य में जो लिखा है, वही भोगना पड़ेगा ।"

उधर, जब रानी की बहन की बृहस्पतिवार की कथा समाप्त हुई और भगवान विष्णु का पूजन संपन्न हुआ, तब वह सोचने लगी कि मेरी बहन की दासी आई थी और मैंने उसे कोई उत्तर नहीं दिया। वह अवश्य ही बहुत दुखी हुई होगी और उसने मेरी बहन से जाकर कुछ का कुछ कहा होगा ।

यह विचार कर रानी की बहन स्वयं अपनी बहन (रानी) के घर मिलने आई। उसने रानी को अत्यंत दीन और दुर्बल दशा में देखा। बहन ने रानी से कहा, "हे बहन! मेरी बात का बुरा मत मानना। जब तुम्हारी दासी मेरे घर गई थी, तब मैं भगवान बृहस्पति देव की कथा सुन रही थी। कथा के बीच में न तो बोला जाता है और न ही उठा जाता है, इसी कारण मैं कुछ बोल न सकी ।"

रानी की बहन ने आगे पूछा, "अब तुम बताओ कि तुमने दासी को क्यों भेजा था?"

रानी ने अपने नेत्रों में आंसू भरकर अपनी दुर्दशा का वर्णन किया और बताया कि वे लोग कई दिनों से भूखे हैं और घर में अन्न का एक दाना भी नहीं है ।

बहन ने रानी को सांत्वना देते हुए कहा, "हे बहन! भगवान बृहस्पति देव अत्यंत दयालु हैं। वे सबकी मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं और सबका संकट हरते हैं। तुम एक बार अपने घर के अंदर कोठरी में जाकर देखो, शायद भगवान की कृपा से कोई अनाज मिल जाए ।"

रानी की दासी को इस बात पर विश्वास नहीं हुआ, फिर भी वह घर के भीतर गई। भीतर जाकर उसे घोर आश्चर्य हुआ। उसने देखा कि वहां एक घड़ा बेझर (अनाज) से पूरा भरा हुआ रखा था! यह चमत्कार देखकर दासी और रानी को बड़ा अचंभा हुआ और भगवान बृहस्पति देव की शक्ति पर उनका दृढ़ विश्वास जागृत हो गया।

दासी ने रानी से कहा, "हे रानी! जब हमें अन्न नहीं मिलता और हम भूखे रहते हैं, तो वह भी एक प्रकार से व्रत ही है। तो क्यों न हम भी विधि-विधान से बृहस्पतिवार का व्रत करें और भगवान की कथा सुनें? आप अपनी बहन से इस व्रत की विधि पूछ लीजिए ।"

रानी ने अपनी बहन से अत्यंत विनम्रतापूर्वक बृहस्पतिवार व्रत की विधि और पूजन पद्धति पूछी।

बहन ने विधि बताते हुए कहा, "बृहस्पतिवार के दिन प्रातःकाल स्नानादि से निवृत्त होकर पीले वस्त्र धारण करें। केले के वृक्ष की जड़ में श्री हरि विष्णु भगवान और बृहस्पति देव का ध्यान करते हुए पूजन करें । पूजन में चने की दाल, मुनक्का (या गुड़), पीले पुष्प और पीला चंदन अर्पित करें। दिन भर मन में भगवान का स्मरण करें। दिन में केवल एक ही समय भोजन करें और वह भोजन पीले रंग का होना चाहिए, तथा उसमें नमक का प्रयोग वर्जित है । पूजन के पश्चात प्रेमपूर्वक गुरु महाराज की कथा सुनें । इस प्रकार व्रत करने से भगवान बृहस्पति देव प्रसन्न होते हैं, सभी पाप नष्ट होते हैं और सुख-संपत्ति वापस लौट आती है।"

यह संपूर्ण विधि बताकर बहन अपने घर लौट गई।

बृहस्पति देव की कृपा और सुख-समृद्धि की वापसी

अगले बृहस्पतिवार को रानी और दासी ने पूर्ण श्रद्धा के साथ व्रत रखा। उन्होंने विधि-विधान से केले की जड़ में पूजन किया। परंतु उनके पास पीला भोजन पकाने या ग्रहण करने के लिए कोई सामग्री नहीं थी। वे दोनों अत्यंत व्याकुल थीं कि व्रत का पारण कैसे होगा।

उनकी सच्ची श्रद्धा और पश्चाताप को देखकर अंतर्यामी भगवान बृहस्पति देव अत्यंत प्रसन्न हुए। वे एक साधारण मनुष्य का वेष धारण करके दो सुंदर थालों में स्वादिष्ट पीला भोजन लेकर आए और द्वार पर दासी को देकर बोले, "हे दासी! यह पीला भोजन तुम्हारे लिए और तुम्हारी रानी के लिए है, इसे तुम दोनों ग्रहण करना ।"

दासी भोजन पाकर अत्यंत प्रसन्न हुई। उसने दौड़कर रानी को यह बात बताई। रानी को विश्वास नहीं हुआ, उसने सोचा कि दासी उसका मजाक उड़ा रही है। तब दासी ने कहा, "हे रानी! मैं सत्य कह रही हूँ, एक साधारण व्यक्ति अभी-अभी दो थालों में हम दोनों के लिए सुंदर पीला भोजन दे गया है ।"

तब रानी ने भगवान बृहस्पति देव को बारंबार प्रणाम किया और दोनों ने साथ-साथ बैठकर वह पीला भोजन ग्रहण किया।

इसके बाद से रानी और दासी प्रत्येक बृहस्पतिवार को पूर्ण निष्ठा से भगवान का व्रत और पूजन करने लगीं। बृहस्पति भगवान की असीम कृपा से कुछ ही समय में उनके पास फिर से अपार धन-संपत्ति आ गई और उनका घर धन-धान्य से भर गया ।

परंतु, अपार धन वापस आते ही रानी के स्वभाव में फिर से परिवर्तन आने लगा और वह पहले की भांति आलस्य करने लगी।

तब उसकी ज्ञानवान दासी ने रानी को टोकते हुए समझाया, "देखो रानी! तुम पहले भी इसी प्रकार आलस्य किया करती थीं। तुम्हें धन को सहेज कर रखने में कष्ट होता था, और तुम्हारे अंहकार के कारण ही भगवान ने हमारा सारा धन नष्ट कर दिया था । अब जब भगवान गुरु (बृहस्पति) की परम कृपा से हमें पुनः यह अपार धन प्राप्त हुआ है, तो तुम्हें फिर से आलस्य हो रहा है। बड़ी मुसीबतों, कष्टों और सात दिन की भूख के बाद हमने यह धन पुनः पाया है, इसलिए हमें पहले वाली भूल कदापि नहीं करनी चाहिए ।"

दासी ने आगे कहा, "हमें इस धन का संचय नहीं करना चाहिए बल्कि इससे दान-पुण्य करना चाहिए। तुम भूखे मनुष्यों को भोजन कराओ, प्याऊ लगवाओ, ब्राह्मणों को दान दो, कुआं-तालाब-बावड़ी आदि का निर्माण करवाओ, मंदिर-पाठशाला बनवाकर ज्ञान दान दो, निर्धन और कुंवारी कन्याओं का विवाह करवाओ । धन को शुभ कार्यों में खर्च करो, जिससे तुम्हारे कुल का यश बढ़े, तुम्हारे पितर प्रसन्न हों और अंत में स्वर्ग की प्राप्ति हो ।"

दासी की इस सत्य और ज्ञानपूर्ण बात को मानकर रानी ने अपना धन शुभ कर्मों और दान-पुण्य में व्यतीत करना आरंभ कर दिया। वह नित्य गरीबों की सहायता करने लगी, जिससे संपूर्ण नगर और दिशाओं में उसका यश और कीर्ति फैलने लगी ।


3. मुख्य कथा: द्वितीय संस्करण (लकड़हारे के रूप में राजा और निर्धन ब्राह्मण की कथा)

राजा का वन-वास और साधु से भेंट

इधर रानी और दासी अपने राज्य में आनंदपूर्वक रहने लगीं। एक दिन वे दोनों आपस में विचार करने लगीं कि न जाने हमारे राजा परदेस में किस दशा में होंगे? उनकी कोई खोज-खबर भी नहीं है। उन्होंने भगवान बृहस्पति देव के सम्मुख हाथ जोड़कर श्रद्धापूर्वक प्रार्थना की कि हे प्रभु! राजा जहां कहीं भी हों, उनकी रक्षा करना और उन्हें शीघ्र वापस हमारे पास ले आना ।

दूसरी ओर, राजा परदेस में एक बहुत ही दुखी और कष्टप्रद जीवन व्यतीत कर रहा था। वह प्रतिदिन घने जंगल से लकड़ी बीनकर लाता और शहर में बेचकर बड़ी कठिनता से अपना पेट पालता था । एक दिन राजा अपनी पुरानी राजसी बातों, सुख-सुविधाओं और अपने परिवार को याद करके वन में एक वृक्ष के नीचे बैठकर अत्यंत उदास हो गया और फूट-फूट कर रोने लगा ।

राजा के इस दुख को देखकर भगवान बृहस्पति देव का हृदय पसीज गया। वे एक अत्यंत तेजस्वी और दयालु साधु के वेष में राजा के समीप आए और मधुर स्वर में बोले, "हे लकड़हारे! तुम इस सुनसान और भयंकर जंगल में किस चिंता में मग्न बैठे हो? तुम्हारे नेत्रों से अश्रु क्यों बह रहे हैं? मुझे अपना दुख बतलाओ ।"

साधु के प्रेमपूर्ण वचन सुनकर राजा के नेत्रों में जल भर आया। राजा ने उठकर साधु रूपी देव को साष्टांग वंदना की और अपनी संपूर्ण कहानी, अपने राज्य के छिनने, रानी के व्यवहार और अपने निर्धन होने का सारा वृत्तांत विस्तारपूर्वक उन्हें सुना दिया ।

महात्मा अत्यंत दयालु होते हैं, वे राजा की व्यथा सुनकर बोले, "हे राजा! तुम्हारी पत्नी ने देवगुरु बृहस्पति के प्रति भारी अपराध किया था और उनका अपमान किया था, जिसके कारण ही तुम्हारी यह दुर्दशा हुई है । परंतु अब तुम किसी भी प्रकार की चिंता मत करो। भगवान अत्यंत कृपालु हैं, वे तुम्हें तुम्हारे पहले वैभव से भी अधिक धन-संपत्ति प्रदान करेंगे । देखो, तुम्हारी पत्नी ने अपने राज्य में अपनी भूल सुधारते हुए बृहस्पतिवार का व्रत प्रारंभ कर दिया है, जिसके प्रभाव से उनका कष्ट दूर हो गया है। अब तुम भी बृहस्पतिवार का व्रत करो । तुम चने की दाल और गुड़ जल के लोटे में डालकर केले के वृक्ष का पूजन करो और फिर व्रत की कथा कहो या सुनो। भगवान तुम्हारी सभी मनोकामनाओं को अवश्य पूर्ण करेंगे ।"

साधु की बात सुनकर राजा ने हाथ जोड़कर अत्यंत दीन स्वर में कहा, "हे प्रभो! मैं जंगल से लकड़ी बेचकर इतना पैसा भी नहीं कमा पाता जिससे मैं अपने भोजन के उपरांत कुछ भी धन बचा सकूं । मैंने बीती रात्रि स्वप्न में अपनी रानी को व्याकुल देखा है, मेरे पास कोई साधन नहीं है जिससे मैं उसका समाचार जान सकूं । और फिर, मैं बृहस्पति देव की क्या कहानी कहूं? मुझे तो उनकी कोई कथा या व्रत की विधि मालूम भी नहीं है ।"

साधु ने राजा को सांत्वना देते हुए कहा, "हे राजा! तुम अपने मन में दृढ़ निश्चय करके भगवान बृहस्पति देव के पूजन और व्रत का संकल्प करो, वे स्वयं तुम्हारे लिए राह बना देंगे । बृहस्पतिवार के दिन तुम रोजाना की भांति जंगल से लकड़ियां लेकर शहर में जाना। मैं तुम्हें वचन देता हूँ कि उस दिन तुम्हें अपनी लकड़ियों का रोज से दोगुना मूल्य प्राप्त होगा । उस धन से तुम भली-भांति अपना भोजन भी कर लोगे और बृहस्पति देव की पूजा का सामान—चना, गुड़, मुनक्का आदि—भी आसानी से आ जाएगा । और जो तुमने बृहस्पतिवार की कहानी के विषय में पूछा है, वह कथा इस प्रकार है, ध्यानपूर्वक सुनो:"

साधु द्वारा वर्णित निर्धन ब्राह्मण और स्वर्ण सूप की कथा

(यहाँ साधु रूपी बृहस्पति देव लकड़हारे को एक अन्य कथा सुनाते हैं, जो बृहस्पतिवार व्रत की महिमा को सिद्ध करती है।)

"प्राचीनकाल की बात है, एक बहुत ही निर्धन ब्राह्मण रहता था। उसकी कोई संतान नहीं थी और वह अत्यंत दरिद्रता में अपना जीवन जी रहा था । वह ब्राह्मण स्वभाव से बहुत ही धार्मिक था और नित्य नियम से स्नान-ध्यान और पूजा-पाठ करता था। परंतु, उसकी स्त्री न तो कभी स्नान करती थी, न स्वच्छता रखती थी और न ही किसी देवी-देवता का पूजन करती थी। वह सदैव धर्म-कर्म से दूर रहती थी । अपनी पत्नी के इस व्यवहार के कारण ब्राह्मण देवता सदैव बहुत दुखी रहते थे ।

भगवान की असीम कृपा से कुछ समय पश्चात् उस ब्राह्मण के घर एक अत्यंत सुंदर कन्या उत्पन्न हुई । वह कन्या जैसे-जैसे बड़ी होने लगी, वह अपनी माता के विपरीत अत्यंत धार्मिक और सात्विक प्रवृत्ति की हो गई । वह कन्या नित्य प्रातः काल उठकर स्नान करती और भगवान विष्णु के मंदिर जाकर उनके दर्शन व पूजन करती थी । उसने पूर्ण श्रद्धा से प्रत्येक बृहस्पतिवार का व्रत भी रखना प्रारंभ कर दिया था ।

उस कन्या के व्रत और पूजन के प्रभाव से एक अद्भुत चमत्कार होने लगा। वह कन्या जब भी प्रतिदिन अपनी पाठशाला (विद्यालय) पढ़ने लिए जाती, तो अपनी मुट्ठी में जौ (Barley) के दाने भर कर ले जाती और रास्ते में उन जौ के दानों को गिराते हुए जाती थी । भगवान बृहस्पति देव की उस कन्या पर इतनी असीम कृपा थी कि जब वह पाठशाला से वापस लौटती, तो वे सभी जौ के दाने शुद्ध स्वर्ण (सोने) के दानों में परिवर्तित हो चुके होते थे! कन्या अत्यंत प्रसन्न होकर उन स्वर्ण के दानों को बीन कर एकत्रित कर लेती और घर ले आती थी । इस प्रकार ब्राह्मण के घर में दरिद्रता दूर होने लगी。

एक दिन जब वह कन्या उन स्वर्ण के दानों को एक साधारण सूप (अनाज साफ करने का पात्र) में रखकर साफ कर रही थी, तब उसकी माता ने यह दृश्य देखा। माता ने आश्चर्यचकित होकर कन्या से कहा, 'हे पुत्री! सोने के जौ को साफ करने के लिए यह साधारण सूप उचित नहीं है, इसके लिए तो सोने का ही सूप होना चाहिए ।'

अपनी माता की बात सुनकर कन्या ने अगले बृहस्पतिवार को विधि-विधान से व्रत रखा और भगवान बृहस्पति देव से सच्चे मन से प्रार्थना की कि 'हे प्रभु! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं और मेरा व्रत स्वीकार है, तो मुझे स्वर्ण के जौ साफ करने के लिए एक सोने का सूप (Golden winnowing basket) प्रदान करें ।'

भगवान बृहस्पति देव तो अत्यंत दयालु और भक्तों के मनोरथ पूर्ण करने वाले हैं, उन्होंने उस कन्या की सच्ची प्रार्थना तुरंत स्वीकार कर ली। जब वह कन्या अगले दिन अपनी पाठशाला से घर लौट रही थी, तो भगवान ने चमत्कार स्वरूप उसके मार्ग में एक अत्यंत सुंदर स्वर्ण का सूप रख दिया । कन्या उस सूप को पाकर अत्यंत प्रसन्न हुई और घर लाकर उसी सोने के सूप से सोने के जौ साफ करने लगी ।

उसी समय देवयोग से उस नगर का राजकुमार वहां से अपने घोड़े पर सवार होकर गुजर रहा था । उसने देखा कि एक अत्यंत रूपवान कन्या एक स्वर्ण के सूप में स्वर्ण के जौ साफ कर रही है। राजकुमार उस कन्या के अलौकिक रूप, सौंदर्य और उसके चमत्कार पर पूरी तरह मोहित हो गया ।

राजकुमार ने तुरंत अपने राजमहल जाकर अपने माता-पिता (राजा-रानी) से हठ पकड़ ली कि वह यदि विवाह करेगा तो उसी ब्राह्मण की कन्या से करेगा, अन्यथा प्राण त्याग देगा । राजकुमार की हठ देखकर राजा ने अपने मंत्रियों और पुरोहितों को उस निर्धन ब्राह्मण के घर भेजा। ब्राह्मण ने राजा का यह प्रस्ताव सहर्ष स्वीकार कर लिया。

शीघ्र ही उस निर्धन ब्राह्मण की धार्मिक कन्या का विवाह उस राज्य के राजकुमार के साथ अत्यंत धूमधाम से संपन्न हो गया । कन्या के भाग्य और देवगुरु बृहस्पति की कृपा से ब्राह्मण का परिवार भी रातों-रात धन-धान्य, ऐश्वर्य और मान-सम्मान से परिपूर्ण हो गया और उनके सभी दुख दरिद्र सदा के लिए दूर हो गए ।"

यह कथा सुनाकर साधु रूपी भगवान बृहस्पति देव ने लकड़हारे (राजा) से कहा, "हे राजा! यह है बृहस्पतिवार के व्रत का महात्म्य। अब तुम भी इसी प्रकार पूर्ण निष्ठा से व्रत और कथा करना।" इतना कहकर साधु महाराज वहां से अंतर्ध्यान हो गए ।

राजा का व्रत और भूल का परिणाम

अगले दिन बृहस्पतिवार था। राजा नित्य की भांति जंगल से लकड़ी काटकर शहर बेचने गया और साधु के वचनानुसार आश्चर्यजनक रूप से उसे अपनी लकड़ियों का रोज से दोगुना मूल्य प्राप्त हुआ । राजा अत्यंत प्रसन्न हुआ। उस धन से राजा ने गुड़, चने की दाल और पीले पुष्प खरीदे और जंगल में आकर श्रद्धापूर्वक केले की जड़ में भगवान बृहस्पति देव का पूजन किया और स्वयं ही कथा कही । उस व्रत के प्रभाव से राजा के सभी दुख-क्लेश दूर होने लगे और उसे शांति प्राप्त हुई。

परंतु दुर्भाग्यवश, जब अगला बृहस्पतिवार आया तो राजा अपने कार्यों में इतना उलझ गया कि वह बृहस्पतिवार का व्रत करना भूल गया । इस भयंकर भूल के कारण भगवान बृहस्पति देव उससे रुष्ट हो गए। (इस नियम-भंग के कारण लोक-कथाओं में वर्णन आता है कि राजा पर चोरी का झूठा आरोप लगा और उसे कारागार में डाल दिया गया। कारागार में उसने अपनी भूल का स्मरण किया और भगवान से क्षमा याचना की। भगवान ने उसे स्वप्न में दर्शन देकर पुनः व्रत करने का आदेश दिया। जब राजा ने क्षमा मांगकर पुनः व्रत आरंभ किया, तो वह दोषमुक्त होकर कारागार से बाहर आ गया।) राजा ने अपनी भूल सुधारते हुए पुनः पूर्ण निष्ठा से व्रत प्रारंभ किया。


4. मुख्य कथा: तृतीय संस्करण (राजा की स्वदेश वापसी और कथा के चमत्कार)

जब राजा ने निरंतर निष्ठापूर्वक बृहस्पतिवार का व्रत करना शुरू किया, तो भगवान की कृपा से राजा के दिन सुधर गए और उसके पास धन एकत्रित होने लगा । उसने अपने नगर (स्वदेश) और अपनी रानी के पास वापस लौटने का निश्चय किया。

मार्ग में यात्रा करते हुए राजा के पास चने की दाल और गुड़ था। उस दिन बृहस्पतिवार था और राजा चाहता था कि वह बृहस्पतिवार की कथा किसी को सुनाए, क्योंकि पारंपरिक नियम के अनुसार व्रत की कथा अकेले नहीं कही या सुनी जाती, श्रोता का होना अनिवार्य है。

शव का जीवित होना (पहला चमत्कार)

राजा एक स्थान पर पहुंचा जहां उसने देखा कि कुछ लोग विलाप करते हुए एक मुर्दे (शव) को श्मशान की ओर ले जा रहे थे । राजा ने उन लोगों के मार्ग में जाकर आग्रह किया, "हे भाइयो! मैं बृहस्पतिवार के व्रत में हूँ। क्या तुम मेरी बृहस्पतिवार की कथा सुनोगे?"

राजा की बात सुनकर उनमें से कुछ लोग अत्यंत क्रोधित हुए और बोले, "हमारा आत्मीय मर गया है, हम शोक में डूबे हैं और इस पागल व्यक्ति को कथा सुनाने की सूझ रही है!" परंतु उनमें से कुछ समझदार और वृद्ध लोग बोले, "ठीक है भाई, कहो। हम तुम्हारी कथा सुनेंगे ।"

राजा ने प्रसन्न होकर अपनी चने की दाल और गुड़ निकाला और पूर्ण भक्ति भाव से कथा कहनी आरंभ कर दी । राजा अभी कथा के मध्य में ही पहुँचा था कि भगवान बृहस्पति देव के अद्भुत चमत्कार से अर्थी पर लेटा हुआ वह मुर्दा हिलने लगा । और जैसे ही राजा ने व्रत कथा पूर्ण रूप से समाप्त की, वह मृत व्यक्ति "राम-राम" कहता हुआ जीवित होकर खड़ा हो गया! यह अलौकिक चमत्कार देखकर वहां उपस्थित सब लोग आश्चर्यचकित रह गए और भगवान बृहस्पति देव की जय-जयकार करने लगे。

किसान के बैलों का मूर्छित होना (दूसरा चमत्कार)

राजा वहां से आगे बढ़ा। चलते-चलते शाम होने लगी। मार्ग में राजा ने देखा कि एक किसान अपने खेत में बैलों के साथ हल चला रहा है । राजा ने उस किसान के पास जाकर कथा सुनने का आग्रह किया, "हे भाई! मेरी बृहस्पतिवार की कथा सुन लो।" परंतु किसान ने इंकार कर दिया और अंहकार में कहा कि उसके पास कथा सुनने का समय नहीं है, उसे अपना खेत जोतना है ।

राजा चुपचाप वहां से आगे चल पड़ा। राजा के वहां से हटते ही तुरंत चमत्कार हुआ—किसान के जो बैल हल खींच रहे थे, वे पछाड़ खाकर धरती पर गिर पड़े और मूर्छित हो गए, तथा उस किसान के पेट में अचानक अत्यंत भयंकर दर्द उठने लगा, जिससे वह तड़पने लगा ।

उसी समय उस किसान की वृद्धा माता खेत पर अपने पुत्र के लिए रोटी लेकर आई। जब उसने अपने पुत्र को तड़पते और बैलों को धरती पर गिरे हुए देखा, तो घबराकर उसने पुत्र से इस विपत्ति का कारण पूछा । बेटे ने कराहते हुए बताया कि एक घुड़सवार (राजा) आया था और वह कोई कथा सुनाना चाहता था, परंतु मैंने अहंकारवश मना कर दिया, जिसके तुरंत बाद ही यह सब विपत्ति आ पड़ी ।

बुढ़िया समझ गई कि यह किसी देवता का प्रकोप है और मेरे पुत्र से घोर अपराध हुआ है। वह दौड़ी-दौड़ी उसी मार्ग पर गई और उस घुड़सवार (राजा) को ढूंढ निकाला। उसने राजा के चरणों में गिरकर क्षमा मांगते हुए कहा, "हे भाई! मेरे पुत्र से अपराध हुआ है। तू लौटकर अपनी कथा मेरे खेत पर ही चलकर कहना, मैं तेरी कथा पूर्ण श्रद्धा से सुनूंगी ।"

राजा ने लौटकर बुढ़िया के खेत पर गया और वहां बैठकर श्रद्धापूर्वक चने की दाल रखकर पूरी कथा कही। कथा के समाप्त होते ही एक और चमत्कार हुआ—मूर्छित बैल पुनः उठकर खड़े हो गए और किसान के पेट का दर्द भी पूरी तरह शांत हो गया ।

परिवार से पुनर्मिलन और सुख-समृद्धि

राजा आगे की यात्रा करता हुआ अपनी रानी की बहन के नगर जा पहुंचा। बहन ने अपने जीजा (राजा) को देखा तो अत्यंत प्रसन्न हुई। उसने भाई की खूब मेहमानी और आदर-सत्कार किया ।

अगले दिन जब प्रातः काल राजा जागा तो उसने देखा कि महल में सभी लोग भोजन कर रहे हैं। परंतु उस दिन बृहस्पतिवार था। राजा ने अपनी बहन से पूछा, "क्या इस नगर में ऐसा कोई मनुष्य है जिसने अभी तक भोजन न किया हो और जो मेरी बृहस्पतिवार की कथा सुन सके?" बहन ने खोजकर एक श्रोता की व्यवस्था की, इस प्रकार राजा ने कथा सुनाने का अपना नियम टूटने नहीं दिया。

अंत में राजा अपने राज्य और अपने महल में वापस लौट आया। जब रानी और दासी ने राजा को सुरक्षित और स्वस्थ वापस देखा तो उनकी प्रसन्नता का कोई ठिकाना न रहा। रानी ने राजा के चरणों में गिरकर अपने पुराने कर्मों के लिए क्षमा मांगी और बताया कि उसने भी गुरु भगवान का व्रत आरंभ कर दिया है ।

राजा और रानी दोनों मिलकर आनंदपूर्वक जीवन-यापन करने लगे । दोनों सच्ची भावना से भगवान बृहस्पति देव की कथा का गुणगान करते और नियमपूर्वक व्रत का पालन करते। पूर्व में निसंतान होने के कारण रानी को लोगों के ताने सुनने पड़ते थे और उसकी बहन भी उससे दूरी रखती थी , परंतु भगवान बृहस्पति देव की आराधना से राजा को स्वप्न में साक्षात देवगुरु ने दर्शन दिए और संतान प्राप्ति का वरदान दिया । नौवें महीने में रानी के गर्भ से एक अत्यंत सुंदर, स्वस्थ और तेजस्वी पुत्र पैदा हुआ । भगवान बृहस्पति देव की कृपा से उस राज्य में पुनः धन-धान्य की वर्षा होने लगी。


5. मुख्य कथा: चतुर्थ संस्करण (सेठ और सेठानी की लोक-प्रचलित कथा)

(बृहस्पतिवार व्रत के अंतर्गत कई क्षेत्रों में भगवान विष्णु की महिमा को दर्शाने वाली सेठ और सेठानी की यह लोक-प्रचलित कथा भी पूर्ण श्रद्धा से पढ़ी और सुनी जाती है ।)

प्राचीन काल में एक नगर में एक धर्मपाल नाम का सेठ अपनी सेठानी के साथ रहता था । सेठानी अत्यंत सात्विक और भगवान श्री हरि विष्णु की अनन्य भक्त थी। वह सदैव घूंघट (पर्दे) में रहकर मर्यादा का पालन करती थी और प्रत्येक बृहस्पतिवार का व्रत रखती थी ।

एक दिन बृहस्पतिवार के व्रत के अवसर पर सेठानी ने स्नानादि से निवृत्त होकर पवित्रता से भोजन बनाया। सबसे पहले उसने उस भोजन का भगवान श्री विष्णु को भोग लगाया । भगवान को भोग अर्पित करने के पश्चात्, वह अपने परिवार जनों को भोजन परोसने लगी。

जब सेठानी अपने पति (सेठ) की थाली परोसने लगी, तो एक अद्भुत और अलौकिक घटना घटी। साक्षात् भगवान विष्णु ने अदृश्य रूप में आकर सेठानी का हाथ पकड़ लिया ।

सेठानी का हाथ रुक गया। यह देखकर उसके भाइयों और सेठ ने आश्चर्य से पूछा, "बहन! तुम यह क्या कर रही हो? तुमने भोजन परोसते-परोसते अपना हाथ क्यों रोक लिया?"

सेठानी ने अत्यंत भाव-विभोर होकर उत्तर दिया, "भाई! मैं तो कुछ भी नहीं कर रही हूँ। मेरा हाथ तो स्वयं श्री विष्णु भगवान ने पकड़ रखा है ।" (तात्पर्य यह था कि भगवान नहीं चाहते थे कि उनका प्रसाद ग्रहण करने से पूर्व कोई और उस भोजन को ग्रहण करे)।

सेठानी की यह बात सुनकर परिवार वालों को विश्वास नहीं हुआ। भाई बोले, "यदि साक्षात् भगवान यहाँ उपस्थित हैं, तो बहन, हमें भी अपने भगवान के दर्शन कराओ ।"

सेठानी ने सच्चे मन से भगवान विष्णु और बृहस्पति देव से प्रार्थना की कि 'हे प्रभु! मेरे परिवार के अज्ञान को दूर करें और इन्हें अपने दिव्य स्वरूप का दर्शन दें।' सेठानी की करुण पुकार सुनकर भगवान श्री विष्णु ने वहां उपस्थित सभी लोगों को अपने चतुर्भुज रूप में साक्षात् दर्शन दिए ।

भगवान के अलौकिक तेज और दर्शन से सेठ और भाई अभिभूत हो गए। सेठ ने सेठानी से अपने अज्ञान के लिए बारंबार माफी मांगी । भाइयों ने बहन को बहुत सा धन-संपत्ति देकर विदा किया। उस दिन के पश्चात् सेठ और सेठानी दोनों मिलकर भगवान विष्णु और बृहस्पति देव की पूजा करने लगे । भगवान की कृपा से उनके घर में अन्न और धन के भंडार सदैव के लिए भर गए ।

(पारंपरिक नियम: इस कहानी का नियम मकर संक्रांति से लिया जाता है। एक वर्ष तक यह कहानी कहकर भगवान विष्णु को पीला पीतांबर, पाव चने की दाल, पाव गुड़, सवा रुपये, लक्ष्मी जी का श्रृंगार का सामान, साड़ी और दक्षिणा दान में दी जाती है ।)


6. पारंपरिक उपसंहार एवं फलश्रुति (महिमा)

कथा के अंत में पारंपरिक रूप से भगवान बृहस्पति देव की महिमा और व्रत का फल-वचन (फलश्रुति) पढ़ा जाता है। यह फलश्रुति श्रोताओं के मन में अगाध श्रद्धा उत्पन्न करती है:

"जो कोई भी प्राणी सद्भावना पूर्वक बृहस्पतिवार का व्रत करते हैं एवं भगवान बृहस्पति देव की यह कथा पढ़ते हैं, अथवा श्रद्धा से दूसरों को सुनाते हैं और स्वयं सुनते हैं, भगवान बृहस्पति देव उनकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं और उनकी सदैव रक्षा करते हैं ।

इस व्रत के प्रभाव से प्राणी को धन, पुत्र, विद्या, सुख और मनोवांछित फलों की प्राप्ति होती है । बृहस्पतिवार का व्रत करने और कथा सुनने से मनुष्य के जीवन में सुख-समृद्धि का आगमन होता है, बड़ी से बड़ी गरीबी और दरिद्रता का हरण हो जाता है ।

स्त्रियों के लिए यह व्रत अति फलदायी है । इस व्रत को करने से स्त्रियों को अखंड सौभाग्य, पारिवारिक कल्याण और सुहाग की प्राप्ति होती है। जो मनुष्य इस कथा को श्रद्धापूर्वक पढ़ता या सुनता है, उसके सभी पाप बृहस्पति जी महाराज की असीम कृपा से नष्ट हो जाते हैं ।

इस लोक में सभी प्रकार के असीम सुखों, ऐश्वर्य और धन-धान्य का उपभोग करके, अंत में वह प्राणी मोक्ष को प्राप्त कर भगवान श्री हरि विष्णु के वैकुंठ धाम को जाता है ।

बोलिए श्री हरि विष्णु भगवान की जय!

देवगुरु बृहस्पति महाराज की जय!

श्री लक्ष्मी नारायण भगवान की जय!


7. श्री बृहस्पति देव जी की पारंपरिक आरती

कथा श्रवण के पश्चात्, भगवान को अर्पित किया गया चने की दाल और गुड़ का प्रसाद घर में सबको बांट दिया जाता है । प्रसाद वितरण से पूर्व, सभी भक्त अपने स्थान पर खड़े होकर भगवान बृहस्पति देव की यह पारंपरिक आरती प्रेम सहित गाते हैं ।

ॐ जय बृहस्पति देवा, स्वामी जय बृहस्पति देवा।
छिन छिन भोग लगाऊँ, कदली फल मेवा॥
ॐ जय बृहस्पति देवा...


तुम पूर्ण परमात्मा, तुम अंतर्यामी।
जगतपिता जगदीश्वर, तुम सबके स्वामी॥
ॐ जय बृहस्पति देवा...


चरणामृत निज निर्मल, सब पातक हर्ता।
सकल मनोरथ दायक, कृपा करो भर्ता॥
ॐ जय बृहस्पति देवा...


तन, मन, धन अर्पण कर, जो जन शरण पड़े।
प्रभु प्रकट तब होकर, आकर द्वार खड़े॥
ॐ जय बृहस्पति देवा...


दीनदयाल दयानिधि, भक्तन हितकारी।
पाप दोष सब हर्ता, भव बंधन हारी॥
ॐ जय बृहस्पति देवा...


सकल मनोरथ दायक, सब संशय तारो।
विषय विकार मिटाओ, संतन सुखकारी॥
ॐ जय बृहस्पति देवा...


जो कोई आरती तेरी, प्रेम सहित गावे।
जेष्ठानंद आनंदकर, सो निश्चय पावे॥
ॐ जय बृहस्पति देवा...

(आरती के पश्चात् शंख और घंटी बजाकर भगवान को साष्टांग प्रणाम किया जाता है।)

॥ इति श्री बृहस्पतिवार व्रत कथा संपूर्ण ॥

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