मंगलवार व्रत (श्री हनुमान जी) की संपूर्ण, पारंपरिक एवं प्रामाणिक व्रत-कथा
सनातन हिंदू धर्म में मंगलवार का दिन शक्ति, भक्ति, और संकट मोचन के साक्षात् स्वरूप श्री हनुमान जी महाराज तथा नवग्रहों में सेनापति मंगल देव की आराधना के लिए अत्यंत पवित्र माना गया है। जो भक्त अपने जीवन से दारिद्र्य, रोग, निःसंतानता, और विविध संकटों का नाश चाहते हैं, वे मंगलवार का व्रत अत्यंत श्रद्धा और नियमपूर्वक धारण करते हैं। किसी भी पारंपरिक व्रत की पूर्णता उसकी प्रामाणिक व्रत-कथा के श्रवण अथवा पठन के बिना असंभव मानी जाती है。
लोक-परंपरा और प्राचीन व्रत-पुस्तिकाओं (जैसे गीता प्रेस एवं अन्य प्रामाणिक धार्मिक प्रकाशनों) में मंगलवार व्रत से संबंधित मुख्य रूप से तीन प्रमुख कथाएँ और एक अनिवार्य लोक-कथा (उप-कथा) प्राप्त होती हैं। इन कथाओं में भक्त की श्रद्धा, ईश्वरीय परीक्षा, और अंततः भगवान के प्रत्यक्ष चमत्कार का अत्यंत मार्मिक वर्णन है。
यह प्रलेख मंगलवार व्रत के दिन पढ़ी जाने वाली सभी पारंपरिक कथाओं का पूर्ण, अक्षुण्ण, और क्रमबद्ध संकलन है। इसमें कथा के मूल स्वरूप, संवादों, और फलश्रुति को उसी रूप में प्रस्तुत किया गया है, जिस रूप में वे सदियों से मंदिरों और घरों में वाची जाती रही हैं。
1. कथा का पारंपरिक प्रारंभ और श्रवण-प्रसंग
मंगलवार व्रत कथा का वाचन कोई साधारण पठन नहीं है; यह इष्टदेव के साथ भक्त के सीधे संवाद का माध्यम है। पारंपरिक रूप से कथा का आरंभ अत्यंत पवित्रता के साथ किया जाता है。
कथा-श्रवण का पारंपरिक प्रसंग
व्रती दिन भर उपवास रखने के पश्चात, सायं काल स्नानादि से निवृत्त होकर शुद्ध लाल वस्त्र धारण करते हैं । एक पवित्र आसन पर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठा जाता है। सम्मुख एक चौकी पर लाल वस्त्र बिछाकर साक्षात् श्री हनुमान जी महाराज और मंगल देव का चित्र अथवा प्रतिमा स्थापित की जाती है । कथा वाचन से पूर्व घी अथवा चमेली के तेल का एक अखंड दीपक प्रज्वलित किया जाता है, जो कथा की पूर्णता तक प्रज्वलित रहता है । व्रती अपने हाथ में जल, लाल पुष्प और अक्षत लेकर कथा श्रवण का संकल्प लेते हैं。
पारंपरिक आरंभिक वाक्य
सनातन कथाओं की शैली के अनुरूप, मंगलवार व्रत कथा का आरंभ भी नैमिषारण्य तीर्थ या किसी पवित्र तपोवन में ऋषियों के संवाद से होता है। पारंपरिक वाकों का स्वरूप इस प्रकार होता है:
"सूत जी बोले – हे शौनक आदि परम ज्ञानी मुनियों! आप लोग अत्यंत बड़भागी हैं जो आपने भगवान की महिमा सुनने की इच्छा प्रकट की है। पृथ्वी पर जिस-जिस ने भी पूर्ण श्रद्धा से मंगलवार का व्रत किया है, श्री संकटमोचन हनुमान जी ने उनके सभी दुखों का तत्काल निवारण किया है । हे ऋषियों! अब मैं आप सबके समक्ष उस परम पावन और अद्भुत मंगलवार व्रत कथा का वर्णन करता हूँ, जिसके श्रवण मात्र से मनुष्य के जन्म-जन्मांतर के पाप नष्ट हो जाते हैं। आप सभी एकाग्र चित्त होकर इस कथा का श्रवण करें।"
इसके पश्चात मुख्य कथाओं का प्रवाह आरंभ होता है。
2. प्रथम पारंपरिक कथा: निःसंतान ब्राह्मण दंपति और बालक 'मंगल' का प्रसंग
मंगलवार व्रत की यह सर्वाधिक प्रचलित और अत्यंत प्रामाणिक कथा है। यह कथा सिद्ध करती है कि ईश्वर पर अगाध विश्वास और निष्ठापूर्वक किया गया व्रत कभी निष्फल नहीं जाता。
निःसंतान विप्र दंपति का परिचय एवं उनका दुःख
प्राचीन काल की बात है, अवंतिका नामक एक अत्यंत सुंदर और समृद्ध नगर में एक ब्राह्मण निवास करता था। वह ब्राह्मण और उसकी धर्मपत्नी (ब्राह्मणी) दोनों ही अत्यंत सात्विक, धर्मनिष्ठ और परोपकारी स्वभाव के थे। उनके घर में धन-धान्य, गौ-धन और मान-सम्मान की कोई कमी नहीं थी। परंतु, विधाता का लेख कुछ और ही था। विवाह के अनेक वर्ष व्यतीत हो जाने के उपरांत भी उनके आँगन में किसी संतान की किलकारी नहीं गूंजी थी ।
पुत्र न होने के कारण वह ब्राह्मण दंपति दिन-रात घोर चिंता और असीम दुःख में डूबे रहते थे। समाज के ताने और वंश के नष्ट हो जाने का भय उन्हें निरंतर सताता रहता था। दोनों पति-पत्नी ईश्वर से प्रार्थना करते रहते कि किसी प्रकार उनके घर में एक सुयोग्य संतान का जन्म हो जाए。
विप्र का वन-प्रस्थान एवं ब्राह्मणी का कठोर संकल्प
जब बहुत समय बीत गया और उनकी कोई भी प्रार्थना फलीभूत नहीं हुई, तब उस विप्र ने यह निश्चय किया कि वह अब घर का त्याग कर वन में जाएगा और वहाँ जाकर श्री हनुमान जी महाराज की कठोर तपस्या करेगा। ब्राह्मण ने अपनी पत्नी से विदा ली और एक घने जंगल की ओर प्रस्थान कर गया। वन में जाकर उसने एक पवित्र स्थान चुना और प्रत्येक मंगलवार को श्री बजरंगबली की अत्यंत कठोर साधना और पूजा आरंभ कर दी । वह दिन-रात केवल पुत्र प्राप्ति की कामना से हनुमान जी के मंत्रों का जाप करता रहता था。
इधर, पति के वन जाने के पश्चात ब्राह्मणी ने भी घर पर रहकर पति के संकल्प को पूर्ण करने का निश्चय किया। उसने भी संतान प्राप्ति की तीव्र लालसा से मंगलवार का व्रत रखना आरंभ कर दिया ।
| ब्राह्मण दंपति के व्रत का पारंपरिक नियम | |
|---|---|
| विवरण | नियम |
| ब्राह्मण का नियम | वन में जाकर प्रत्येक मंगलवार को हनुमान जी की घोर तपस्या और स्तुति करना। |
| ब्राह्मणी का नियम | घर पर मंगलवार का पूर्ण उपवास रखना और सायं काल में नियमपूर्वक व्रत का पालन करना। |
| भोजन का विधान | ब्राह्मणी दिन भर भूखी रहती और संध्या के समय शुद्ध भोजन बनाकर सर्वप्रथम श्री हनुमान जी को भोग लगाती थी, तत्पश्चात ही स्वयं अन्न-जल ग्रहण करती थी । |
ब्राह्मणी की भूल और छः दिवसीय निराहार तपस्या
समय अपनी गति से बीतता रहा। ब्राह्मणी पूर्ण श्रद्धा और भक्ति के साथ अपने मंगलवार के व्रत का पालन कर रही थी। परंतु, एक बार प्रारब्ध वश एक ऐसी घटना घटी जिसने उसकी भक्ति की कठिन परीक्षा ले ली。
किसी मंगलवार के दिन, अत्यधिक अस्वस्थता अथवा घर के किसी अत्यंत अनिवार्य कार्य में उलझ जाने के कारण ब्राह्मणी संध्या के समय भोजन नहीं बना सकी । भोजन न बन पाने के कारण उस दिन वह अपने आराध्य श्री हनुमान जी महाराज को भोग अर्पण नहीं कर सकी। जब उसे अपनी इस भूल का भान हुआ, तो उसका हृदय पश्चात्ताप की अग्नि में जल उठा। उसने इसे अपने इष्टदेव का घोर अपमान और अपने व्रत का खंडन माना。
अपने इस अपराध के प्रायश्चित स्वरूप, उस धर्मपरायण ब्राह्मणी ने उसी क्षण एक अत्यंत कठोर और भयंकर प्रण लिया। उसने संकल्प किया कि— "हे प्रभु! आज मुझसे जो यह घोर अपराध हुआ है, इसका दंड मैं स्वयं को दूँगी। अब मैं पूरे एक सप्ताह तक अन्न और जल का एक दाना भी ग्रहण नहीं करूँगी। जब अगला मंगलवार आएगा, तब मैं भोजन बनाकर सर्वप्रथम आपको भोग लगाऊँगी, और उसके पश्चात ही मैं कुछ ग्रहण करूँगी ।"
अपने इस अटल संकल्प को पूर्ण करने हेतु वह स्त्री अन्न-जल त्याग कर बैठ गई। लगातार छह दिनों तक वह भूखी-प्यासी उसी स्थान पर पड़ी रही । अन्न के अभाव में उसका शरीर सूखकर कांटा हो गया। उसकी आँखों की ज्योति मंद पड़ने लगी और होंठ सूख गए, परंतु उसके मन की श्रद्धा और हनुमान जी के प्रति उसका विश्वास तनिक भी नहीं डिगा। वह दिन-रात केवल 'राम-राम' और हनुमान जी के नाम का स्मरण करती रही。
श्री हनुमान जी का प्रत्यक्ष दर्शन एवं वरदान
छह दिन की घोर तपस्या और निराहार रहने के पश्चात, जब अंततः अगले सप्ताह मंगलवार का दिन उदित हुआ, तब वह ब्राह्मणी शारीरिक रूप से पूर्णतः निढाल हो चुकी थी। भूख और प्यास की भयंकर पीड़ा अब उसके सहन-शक्ति से बाहर हो चुकी थी। अंततः, मूर्च्छित होकर वह भूमि पर गिर पड़ी ।
भक्त की यह पुकार और इतनी घोर निष्ठा देखकर साक्षात् श्री संकटमोचन हनुमान जी महाराज का आसन डोल गया। भक्त-वत्सल प्रभु अपनी भक्त की इस पीड़ा को और अधिक सहन न कर सके। उसी क्षण, आकाश में एक तीव्र प्रकाश उत्पन्न हुआ और श्री हनुमान जी ने अपने अत्यंत दिव्य, तेजोमय और सौम्य रूप में उस ब्राह्मणी को साक्षात् दर्शन दिए ।
हनुमान जी ने अपने कोमल हाथों से उस ब्राह्मणी को उठाया और अत्यंत मधुर स्वर में बोले— "हे पुत्री! उठो। मैं तुम्हारी इस अनन्य भक्ति, सत्यनिष्ठा और कठोर तपस्या से अत्यंत प्रसन्न हूँ। तुमने मुझे भोग लगाने के लिए अपने प्राणों को संकट में डाल दिया। माँगो, तुम क्या वरदान चाहती हो?"
ब्राह्मणी ने अश्रुपूर्ण नेत्रों से प्रभु के चरणों में गिरकर कहा— "हे दयालु! मेरे पास सब कुछ है, केवल एक संतान नहीं है। कृपा करके मुझे एक पुत्र का वरदान दीजिए।"
हनुमान जी ने मुस्कुराते हुए तथास्तु कहा और उसे आशीर्वाद स्वरूप एक अत्यंत सुंदर, तेजस्वी और चंद्र-समान मुख वाला बालक प्रदान किया । भगवान ने कहा— "हे पुत्री! यह बालक मेरे वरदान स्वरूप तुम्हें प्राप्त हुआ है। यह दीर्घायु होगा और आजीवन तुम दोनों पति-पत्नी की सेवा करेगा।" चूँकि वह बालक मंगलवार के व्रत के फलस्वरूप और साक्षात् भगवान के आशीर्वाद से प्राप्त हुआ था, इसलिए ब्राह्मणी ने उस बालक का नाम 'मंगल' रख दिया । बालक को पाकर ब्राह्मणी का जीवन धन्य हो गया और वह अत्यंत लाड़-प्यार से उसका पालन-पोषण करने लगी。
विप्र का लौटना और पत्नी पर संदेह
उधर वन में तपस्यारत ब्राह्मण को भी काफी समय बीत चुका था। जब उसकी तपस्या पूर्ण हुई, तो वह अपना कमंडल और दंड लेकर अपने घर की ओर लौट पड़ा। जब वह अपने घर पहुँचा, तो उसने एक अत्यंत अद्भुत दृश्य देखा। उसके आँगन में एक बहुत ही सुंदर, हृष्ट-पुष्ट और तेजस्वी बालक क्रीड़ा कर रहा था ।
उस बालक को देखकर ब्राह्मण आश्चर्यचकित रह गया। उसने अपनी पत्नी को बुलाया और विस्मय भरे स्वर में पूछा— "हे ब्राह्मणी! यह बालक कौन है? यह कहाँ से आया है? मैं तो वर्षों से वन में था, फिर हमारे घर में यह शिशु कैसे क्रीड़ा कर रहा है?" ।
ब्राह्मणी ने अत्यंत हर्षित होकर और ईश्वर का गुणगान करते हुए अपने पति को संपूर्ण वृत्तांत कह सुनाया। उसने कहा— "हे स्वामी! यह कोई साधारण बालक नहीं है। आपके वन जाने के पश्चात मैंने घर पर मंगलवार का कठोर व्रत किया था। मेरे व्रत और मेरी छह दिन की निराहार तपस्या से प्रसन्न होकर साक्षात् श्री हनुमान जी ने मुझे दर्शन दिए और उन्हीं की कृपा से हमें यह बालक वरदान स्वरूप प्राप्त हुआ है । मैंने इसका नाम मंगल रखा है।"
परंतु, कलियुग के प्रभाव और मानवीय अज्ञानता के कारण, ब्राह्मण के मन में अपनी पत्नी की बातों पर रत्ती भर भी विश्वास नहीं हुआ। उसने सोचा कि यह कैसे संभव है कि भगवान साक्षात् आकर किसी को पुत्र दे जाएँ। ब्राह्मण के मन में अपनी ही धर्मपत्नी के चरित्र के प्रति गहरा संदेह उत्पन्न हो गया। वह सोचने लगा कि अवश्य ही मेरी पीठ पीछे यह स्त्री व्यभिचारिणी (कुलटा) हो गई है, और अपने पाप को छिपाने के लिए यह बालक को हनुमान जी का वरदान बता रही है । यद्यपि उसने मुख से कुछ नहीं कहा, परंतु उसके हृदय में शंका और क्रोध का विष भर गया。
कूप-प्रसंग: बालक मंगल की परीक्षा एवं चमत्कार
संदेह का विष मनुष्य की मति को भ्रष्ट कर देता है। उस ब्राह्मण के साथ भी यही हुआ। वह किसी भी प्रकार से उस बालक मंगल को अपने मार्ग से हटाना चाहता था。
एक दिन की बात है, ब्राह्मण प्रातः काल स्नान और पूजा के लिए कुएं (कूप) पर पानी भरने के लिए जाने लगा। अवसर देखकर ब्राह्मणी ने कहा— "हे स्वामी! आप पानी भरने जा रहे हैं, तो इस मंगल को भी अपने साथ लेते जाइए। यह आपके साथ घूम आएगा और आपका हाथ भी बंटाएगा ।"
ब्राह्मण ने मन ही मन एक भयंकर योजना बनाई और बालक मंगल को अपने साथ ले चला। कुएं पर पहुँचकर, जब वहाँ आस-पास कोई नहीं था, उस निर्दयी ब्राह्मण ने उस छोटे से बालक को धक्का देकर उस गहरे और अंधकारमय कुएं में गिरा दिया ।
बालक को उस अथाह जल में धकेल कर ब्राह्मण ने अपना घड़ा भरा और अत्यंत सामान्य भाव से, मानो कुछ हुआ ही न हो, घर वापस आ गया ।
जब वह घर पहुँचा, तो ब्राह्मणी ने उसे अकेला देखकर स्वाभाविक रूप से पूछा— "स्वामी! आप तो आ गए, परंतु मेरा मंगल कहाँ है? वह आपके पीछे रह गया क्या?" ।
ब्राह्मण अंदर से घबरा गया। इससे पूर्व कि वह कोई झूठी कहानी बनाता या कोई उत्तर देता, अचानक घर के द्वार से एक मीठी सी आवाज़ आई। ब्राह्मणी ने मुड़कर देखा, तो स्वयं बालक मंगल मुस्कुराता हुआ, पूर्णतः सूखा और सुरक्षित अवस्था में घर के भीतर दौड़ा चला आ रहा था । बालक ने आकर अपनी माता को गले लगा लिया。
उस बालक को पूर्णतः जीवित, सुरक्षित और हँसता हुआ देखकर ब्राह्मण के पैरों तले से ज़मीन खिसक गई। वह हतप्रभ और अवाक रह गया । उसे समझ नहीं आ रहा था कि इतने गहरे कुएं में गिरने के पश्चात भी यह बालक जीवित कैसे लौट आया। उस चमत्कार को देखकर ब्राह्मण के मन का कठोर आवरण कुछ ढीला पड़ा और उसे अपनी पत्नी की बात में कुछ सत्यता दिखाई देने लगी ।
स्वप्न में ईश्वरीय आदेश एवं सुखद अंत
उसी रात्रि, जब ब्राह्मण अपने शयनकक्ष में गहरी निद्रा में था, तब करुणानिधान श्री हनुमान जी महाराज (बजरंगबली) ने उसके स्वप्न में दर्शन दिए ।
स्वप्न में भगवान का स्वरूप अत्यंत भव्य था। उन्होंने ब्राह्मण को फटकार लगाते हुए परंतु वात्सल्य पूर्ण स्वर में कहा— "हे मूर्ख ब्राह्मण! तुम अपनी ही परम सती और साध्वी पत्नी पर व्यर्थ में इतना घोर संदेह करते हो । तुम अज्ञानतावश उसे कुलटा क्यों कहते हो? तुम्हारी पत्नी कोई साधारण स्त्री नहीं है, उसकी तपस्या से तीनों लोक कांप गए थे। यह बालक मंगल मैंने ही तुम्हारी और तुम्हारी पत्नी की अगाध भक्ति से प्रसन्न होकर उसे वरदान स्वरूप दिया है । यह मेरा ही बाल रूप है और मेरी ही छाया है। इसे तुम अपना ही पुत्र जानो और इसका पालन-पोषण करो।"
प्रातः काल जब ब्राह्मण की निद्रा टूटी, तो उसका संपूर्ण शरीर पसीने से भीग चुका था, परंतु उसका हृदय एक असीम दिव्य आनंद से भरा हुआ था । सत्य का ज्ञान हो जाने पर उसे अपनी क्षुद्र सोच और अपने द्वारा किए गए घृणित कृत्य पर घोर आत्मग्लानि हुई。
उसने तत्काल अपनी पत्नी के पास जाकर उसे संपूर्ण स्वप्न का वृत्तांत सुनाया। ब्राह्मण ने रोते हुए अपनी पत्नी और उस बालक मंगल से क्षमा मांगी । उसने स्वीकार किया कि अज्ञानतावश उसने बालक को कुएं में धकेल दिया था, परंतु प्रभु ने स्वयं उसकी रक्षा की。
इस सच्चाई को जानकर ब्राह्मण को अपार हर्ष हुआ। उस दिन के पश्चात से वह ब्राह्मण दंपति एक साथ मिलकर, पूर्ण श्रद्धा और नियमपूर्वक मंगलवार को श्री हनुमान जी का व्रत रखने लगे और उनकी इस पावन कथा को नियम से सुनने लगे । मंगलवार व्रत के प्रताप और श्री हनुमान जी की कृपा से धीरे-धीरे उनके जीवन के सभी दुःख, दरिद्रता, और अभाव सदा के लिए समाप्त हो गए। वह परिवार इस लोक में सभी सुखों का भोग कर अंत में परम धाम को प्राप्त हुआ ।
(इति प्रथम कथा संपूर्ण)
3. द्वितीय पारंपरिक कथा: निर्धन वृद्धा स्त्री और साधु-वेश में हनुमान जी द्वारा परीक्षा (मंगलिया का प्रसंग)
मंगलवार व्रत की यह दूसरी कथा लोक-परंपरा और गीता प्रेस जैसी प्रामाणिक व्रत-पुस्तिकाओं में प्रमुखता से पाई जाती है। यह कथा इस बात का जीवंत प्रमाण है कि भगवान अपने भक्तों की कैसी-कैसी कठिन परीक्षा लेते हैं और परीक्षा में उत्तीर्ण होने पर कैसे उन्हें निहाल कर देते हैं। पारंपरिक रूप से इसे इस प्रकार पढ़ा जाता है:
निर्धन वृद्धा और उसके व्रत के नियम
प्राचीन काल की बात है, किसी राज्य के एक छोटे से नगर में एक अत्यंत निर्धन बुढ़िया (वृद्धा स्त्री) रहा करती थी। उस वृद्धा का इस संसार में कोई नहीं था, केवल उसका एक इकलौता पुत्र था, जिसका नाम 'मंगलिया' था । वह बुढ़िया लोगों के घरों में छोटा-मोटा काम करके अपना और अपने पुत्र का पेट पालती थी。
यद्यपि वह अत्यंत गरीब थी, परंतु वह परम धार्मिक और सात्विक विचारों वाली थी। उसकी साक्षात् श्री हनुमान जी महाराज पर अगाध आस्था और अटूट श्रद्धा थी । जीवन में चाहे कितने भी कष्ट आएँ, उसने कभी भगवान का आश्रय नहीं छोड़ा。
वह वृद्धा नियमपूर्वक प्रत्येक मंगलवार को श्री हनुमान जी का उपवास रखती थी और अपने सामर्थ्य के अनुसार जो भी रूखा-सूखा प्राप्त होता, उसे यथाविधि भगवान को भोग लगाकर ही स्वयं ग्रहण करती थी ।
उस वृद्धा के मंगलवार व्रत के कुछ अत्यंत कठोर और विशिष्ट नियम थे, जिनका वह प्राण-पण से पालन करती थी:
| वृद्धा के मंगलवार व्रत के कठोर नियम | |
|---|---|
| विवरण | नियम |
| भूमि को आघात न पहुँचाना | मंगलवार के दिन वह भूलकर भी किसी कार्य के लिए मिट्टी नहीं खोदती थी । |
| घर न लीपना | पारंपरिक कच्चे घरों में मिट्टी और गोबर से लिपाई होती है, परंतु वह वृद्धा मंगलवार के दिन अपने घर को कभी नहीं लीपती थी । |
| अखंड व्रत | बिना हनुमान जी को भोग लगाए जल भी ग्रहण न करना। |
हनुमान जी का साधु-रूप में आगमन और परीक्षा
इसी प्रकार पूर्ण निष्ठा और श्रद्धा के साथ अपने नियमों का पालन करते हुए जब उस वृद्धा को बहुत अधिक समय (वर्षों) व्यतीत हो गए, तब एक दिन साक्षात् श्री हनुमान जी ने विचार किया। उन्होंने सोचा कि "यह बुढ़िया इतने वर्षों से मेरा व्रत कर रही है, चलो आज इस वृद्धा की भक्ति, श्रद्धा और इसके नियमों की कठिन परीक्षा ली जाए।" ।
यह विचार कर श्री हनुमान जी ने एक भस्म-रमाये, जटाधारी साधु (संन्यासी) का वेष धारण किया और सीधे उस वृद्धा की टूटी-फूटी झोपड़ी के द्वार पर जा पहुँचे ।
द्वार पर पहुँचकर साधु रूपी हनुमान जी ने 'अलख निरंजन' का जयघोष किया और उच्च स्वर में पुकारा— "क्या इस घर में, या इस नगर में कोई ऐसा सच्चा हनुमान भक्त है, जो मुझ भूखे साधु की इच्छा को पूरी कर सके?" ।
साधु की यह उच्च पुकार सुनकर वह वृद्धा स्त्री तुरंत घर से बाहर आई। उसने हाथ जोड़कर, अत्यंत श्रद्धाभाव से साधु को प्रणाम किया और विनम्रतापूर्वक पूछा— "हे महाराज! हे तपस्वी! मुझ अकिंचन के द्वार पर पधार कर आपने मुझे धन्य कर दिया। आज्ञा कीजिए, मुझ दासी के लिए क्या सेवा है?" ।
साधु के वेष में श्री हनुमान जी बोले— "हे माई! मैं बहुत दूर से यात्रा करके आया हूँ और अत्यंत भूखा हूँ। मेरा नियम है कि मैं किसी के हाथ का बना भोजन नहीं खाता, मैं अपना भोजन स्वयं बनाऊँगा। तुम बस ऐसा करो कि भोजन पकाने के लिए घर के भीतर की थोड़ी सी ज़मीन (भूमि) पर मिट्टी और गोबर से लीप दो, ताकि मैं उस पवित्र स्थान पर अपना चूल्हा बना सकूँ।" ।
धर्म-संकट और साधु की भयंकर मांग
साधु की यह बात सुनते ही बुढ़िया धर्म-संकट में पड़ गई। अतिथि को भूखा लौटाना महापाप था, परंतु अपने व्रत का नियम तोड़ना भी उसके लिए मृत्यु-समान था。
उसने हाथ जोड़कर, कांपते स्वर में साधु से प्रार्थना की और कहा— "हे महाराज! क्षमा करें। आज मंगलवार का पावन दिन है। आज के दिन मैं न तो मिट्टी खोदती हूँ और न ही घर की ज़मीन लीपती हूँ। यह मेरा बरसों पुराना व्रत का नियम है। ज़मीन लीपने और मिट्टी खोदने के अतिरिक्त आप जो भी अन्य कार्य कहेंगे, चाहे वह मेरे प्राण ही क्यों न हों, मैं आपकी सेवा में अर्पित करने को पूर्णतः तैयार हूँ।" ।
बुढ़िया की यह धर्म-निष्ठा देखकर साधु रूपी हनुमान जी ने अपनी परीक्षा को और अधिक निर्मम बनाने का निश्चय किया。
साधु ने गंभीर स्वर में कहा— "हे माई! यदि तुम भूमि नहीं लीप सकती, तो कोई बात नहीं। परंतु जो मैं विकल्प कहूँगा, क्या तुम उसे पूर्ण करोगी? पहले मुझे तीन बार सत्य-वचन दो।"
वृद्धा ने बिना कुछ विचारे, अतिथि सेवा के धर्म से वशीभूत होकर साधु को तीन बार प्रतिज्ञा दे दी ।
जब वृद्धा ने तीन बार सत्य-वचन दे दिया, तब साधु ने अपना भयंकर और हृदय-विदारक प्रस्ताव रखा। साधु ने कहा— "ठीक है, भूमि मत लीप। तू अपने इकलौते बेटे मंगलिया को मेरे पास यहाँ बुला। मैं उसे ज़मीन पर औंधा (चेहरे के बल) लिटाकर, उसकी पीठ पर ही अपना भोजन बनाऊँगा।" ।
माता का क्रंदन और अग्नि-परीक्षा
साधु के इन कठोर और अमानवीय वचनों को सुनते ही उस वृद्धा के पैरों तले से धरती खिसक गई । उसके मस्तिष्क में अंधकार छा गया और हृदय हाहाकार कर उठा। कोई भी माता अपने नेत्रों के सम्मुख अपने इकलौते पुत्र की पीठ पर आग जलते कैसे देख सकती थी?
परंतु, वह धर्म-परायण स्त्री अपने इष्टदेव के नाम पर उस साधु को वचन हार चुकी थी । उसने विचार किया कि यदि मैंने वचन तोड़ा तो रौरव नरक की भागी बनूँगी और मेरे व्रत का प्रताप नष्ट हो जाएगा। अपने हृदय पर वज्र रखकर, आँखों में आँसू लिए उस माता ने अपने पुत्र मंगलिया को पुकारा और उसे साधु महाराज के हवाले कर दिया ।
परंतु साधु महाराज इतने पर भी पिघलने वाले न थे। उन्होंने वृद्धा की परीक्षा की पराकाष्ठा करते हुए आज्ञा दी कि— "माई! तू अपने ही हाथों से इस मंगलिया को भूमि पर औंधा लिटा, और अपने ही हाथों से लकड़ियाँ रखकर इसकी पीठ पर आग जला।" ।
भक्ति और धर्म के मार्ग पर अडिग उस वृद्धा ने नेत्रों से बहते हुए अश्रुओं की अविरल धारा के बीच, कांपते और थरथराते हाथों से अपने हृदय के टुकड़े, अपने एकमात्र सहारे मंगलिया को भूमि पर औंधा लिटाया। तत्पश्चात, उसी माता ने लकड़ियाँ चुनकर अपने पुत्र की पीठ पर आग जला दी ।
अपने इकलौते पुत्र की पीठ पर आग जलाकर, वह दुःखी और संतप्त माता इस वीभत्स दृश्य को सहन न कर पाने के कारण रोते हुए और विलाप करते हुए अपने घर के भीतर जा घुसी और उसने भीतर से द्वार बंद कर लिया । वह भीतर बैठी-बैठी अपने आराध्य श्री हनुमान जी को पुकारने लगी。
मंगलिया का पुनर्जीवन और ईश्वरीय कृपा
बाहर, साधु रूपी हनुमान जी ने अत्यंत शांतिपूर्वक उस प्रज्वलित अग्नि पर अपना भोजन पकाया। जब भोजन पूर्ण रूप से बनकर तैयार हो गया, तो साधु ने घर के बंद द्वार के समीप जाकर वृद्धा को पुकारा और कहा— "हे माई! बाहर आ। मेरा भोजन अब बन चुका है। अब तू अपने बेटे मंगलिया को ज़रा आवाज़ लगा दे, ताकि वह भी आकर मेरे साथ इस भोजन का भोग लगा ले (प्रसाद पा ले)।" ।
साधु की यह बात सुनकर उस शोकाकुल वृद्धा के नेत्रों से अश्रुओं की बाढ़ आ गई। वह भीतर से ही रोते हुए साधु से कहने लगी— "हे महाराज! आप यह कैसी निष्ठुर बातें कर रहे हैं? उसकी पीठ पर तो आपने अग्नि जलाकर भोजन पकाया है, वह जलकर भस्म हो चुका होगा। अब वह कहाँ से जीवित होगा? अब आप उसका नाम लेकर मेरे इस अभागे और दुःखी हृदय को और मत दुखाओ। आप भोजन ग्रहण करें और प्रस्थान करें।" ।
परंतु साधु महाराज ने हठ किया और उसकी एक न मानी। उन्होंने दृढ़ स्वर में कहा— "नहीं माई! तुझे उसे पुकारना ही पड़ेगा। तू उसे आवाज़ लगा।"
साधु के अत्यधिक हठ करने पर विवश होकर, वृद्धा ने रुंधे हुए कंठ और सिसकियों के साथ मंगलिया को भोजन के लिए पुकारा— "मंगलिया! बेटा मंगलिया! आ जा, साधु महाराज बुला रहे हैं।" ।
वृद्धा के मुख से यह पुकार निकलने की ही देर थी कि द्वार के बाहर से एक मीठी सी आवाज़ आई— "जी माँ! मैं आ गया।" और देखते ही देखते मंगलिया हँसता, खेलता और मुस्कुराता हुआ घर के भीतर दौड़ा चला आया ।
अपने पुत्र मंगलिया को पूर्णतः जीता-जागता, शरीर पर बिना किसी अग्नि के निशान के, अक्षुण्ण और सुरक्षित देखकर उस वृद्धा माता को अत्यंत सुखद आश्चर्य हुआ । उसका हृदय परमानंद से भर गया। उसे यह समझते देर न लगी कि उसके द्वार पर आया यह साधु कोई साधारण मनुष्य नहीं, अपितु स्वयं तीनों लोकों के स्वामी हैं。
वह दौड़कर बाहर आई और गदगद होकर तुरंत उस साधु महाराज के चरणों में गिर पड़ी । तभी साधु के वेश में उपस्थित श्री हनुमान जी महाराज ने उसे अपने असली दिव्य, अत्यंत भव्य और तेजोमय रूप में दर्शन दिए ।
श्री हनुमान जी ने उस वृद्धा को उठाते हुए कहा— "हे माई! तेरी भक्ति, तेरी व्रत-निष्ठा और तेरी सत्यता की परीक्षा में तू शत-प्रतिशत उत्तीर्ण हुई है। तेरे समान भक्त इस संसार में विरले ही हैं।" श्री हनुमान जी ने अत्यंत प्रसन्न होकर उस वृद्धा को सभी प्रकार के सुखों, अचल धन-संपत्ति, और पुत्र के चिरंजीवी होने का आशीर्वाद दिया और तत्पश्चात् वे वहीं अंतर्ध्यान हो गए । वृद्धा और उसका पुत्र मंगलिया अपना शेष जीवन सुखपूर्वक व्यतीत कर अंत में प्रभु के धाम को प्राप्त हुए。
(इति द्वितीय कथा संपूर्ण)
4. तृतीय पारंपरिक कथा: पतिव्रता रत्नावली (रत्नबाला) और मंगल देव की कथा
मंगलवार का व्रत श्री हनुमान जी के साथ-साथ नवग्रहों के अधिपति मंगल देव की प्रसन्नता के लिए भी किया जाता है। कई पारंपरिक लोक-पुस्तिकाओं में मंगल देव की यह कथा मंगलवार व्रत के मुख्य भाग के रूप में अत्यंत श्रद्धा से पढ़ी जाती है。
सोमेश्वर पर संकट और रत्नावली का व्रत
प्राचीन समय की बात है, एक नगर में रत्नावली (जिसे कई स्थानों पर रत्नबाला भी कहा जाता है) नाम की एक अत्यंत पतिव्रता, सुशील और धर्मनिष्ठ स्त्री निवास करती थी। उसका विवाह सोमेश्वर नामक एक अत्यंत विद्वान और गुणी ब्राह्मण से हुआ था । दोनों का जीवन अत्यंत सुखमय व्यतीत हो रहा था。
परंतु, काल की गति बड़ी विचित्र होती है। एक बार किसी कारणवश सोमेश्वर पर मृत्यु-तुल्य प्राणघातक संकट आ पड़ा। उसे एक भयंकर व्याधि ने घेर लिया और वह मृत्यु-शय्या पर लेट गया (कुछ कथाओं के अनुसार वह मृतप्राय हो गया था) । चारों ओर से निराश होकर, उस पतिव्रता पत्नी रत्नबाला ने अपनी पति की प्राण-रक्षा के लिए ग्रहों के सेनापति और महाबली भगवान मंगलदेव का स्मरण किया。
उसने अत्यंत कठोरता के साथ मंगलवार का व्रत धारण किया। प्रातः काल उठकर, स्नान कर, लाल वस्त्र धारण कर, लाल पुष्पों और लाल चंदन से उसने मंगल देव का आवाहन किया और उनकी भावपूर्ण स्तुति की । दिन-रात निराहार रहकर वह केवल अपने पति के प्राणों की भिक्षा मांगती रही。
मंगल देव का प्रकटीकरण और वरदान
रत्नबाला की करुण पुकार, उसके अश्रुओं और उसकी पति-भक्ति के तपोबल से प्रसन्न होकर साक्षात् मंगलदेव उस स्थान पर प्रकट हुए । मंगलदेव का स्वरूप लाल वर्ण का था और उनके मुख पर असीम तेज था。
मंगलदेव ने प्रसन्नचित होकर रत्नावली से कहा— "हे रत्नावली! मैं तेरी अद्भुत पति-भक्ति और मंगलवार के इस निष्काम व्रत से अत्यंत प्रसन्न हूँ। तेरी जो भी अभिलाषा हो, तू अपनी इच्छानुसार वर मांग।" ।
रत्नावली ने हाथ जोड़कर और साष्टांग दंडवत कर अपने पति सोमेश्वर का जीवन दान मांगा ।
यह सुनकर मंगलदेव मुस्कुराए और बोले— "हे रत्नावली! तेरा पति अब अजर-अमर है, वह एक महाविद्वान होगा और संसार में ख्याति प्राप्त करेगा। इसके अतिरिक्त तेरी जो भी इच्छा हो, वह वर भी तू नि:संकोच मांग ले।" ।
तब रत्नबाला ने केवल अपने लिए नहीं, अपितु लोक-कल्याण की भावना से विनीत भाव से प्रार्थना करते हुए कहा— "हे ग्रहों के स्वामी! यदि आप मुझ पर वास्तव में प्रसन्न हैं, तो मुझे यह वरदान दीजिए कि जो भी मनुष्य (चाहे वह पुरुष हो या स्त्री) मंगलवार के दिन प्रातः काल उठकर, स्नान आदि से निवृत्त होकर, लाल पुष्प और लाल चंदन से विधि-विधान पूर्वक आपका पूजन करे तथा आपका स्मरण करे, उसको जीवन में कोई रोग और व्याधि कभी ना सताए ।
"हे प्रभु! उसे अपने स्वजनों और प्रियजनों से जीवन में कभी वियोग का दुःख ना सहना पड़े। उसे सर्प, अग्नि तथा शत्रुओं का भय कभी ना सताए । और जो भी सुहागिन स्त्री पूर्ण श्रद्धापूर्वक मंगलवार का व्रत करे, वह कभी विधवा ना हो तथा उसे अनेक सुपुत्र-पुत्रियों की प्राप्ति हो।" ।
| रत्नबाला द्वारा लोक-कल्याण हेतु मांगे गए वरदान | |
|---|---|
| मंगल देव का फल | विवरण |
| आरोग्य | व्रती को कोई रोग और व्याधि कभी नहीं सताएगी। |
| पारिवारिक सुख | स्वजनों से कभी वियोग नहीं होगा। |
| सुरक्षा | सर्प, अग्नि और शत्रुओं का कोई भय नहीं रहेगा। |
| अखंड सौभाग्य | व्रत करने वाली स्त्री को अखंड सौभाग्य (कभी विधवा न होना) प्राप्त होगा। |
रत्नबाला की इस निस्वार्थ और लोक-कल्याणकारी प्रार्थना को सुनकर मंगलदेव अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने उच्च स्वर में "तथास्तु" कहा और सभी वरदान देकर वहीं अंतर्ध्यान हो गए ।
मंगलदेव की असीम कृपा और आशीर्वाद से मृतप्राय सोमेश्वर उसी क्षण पुनः पूर्णतः स्वस्थ होकर जीवित हो उठा । रत्नबाला अपने पति को पुनः सुरक्षित और स्वस्थ अवस्था में प्राप्त कर बहुत प्रसन्न हुई ।
इस घटना के पश्चात रत्नबाला और उसका पति सोमेश्वर आजीवन प्रत्येक मंगलवार को विधिपूर्वक मंगलवार का व्रत करते रहे। व्रतराज और मंगलदेव की कृपा से उन्होंने इस लोक में अनेक प्रकार के सुख, ऐश्वर्य, धन-धान्य और आनंद का भोग किया। जब उनका लौकिक समय पूर्ण हुआ, तो अंत में वे दोनों पति-पत्नी सशरीर स्वर्ग लोक को प्राप्त हुए ।
(इति तृतीय कथा संपूर्ण)
5. चतुर्थ पारंपरिक लोक-कथा: तपसी और लपसी की कथा (व्रत-श्रवण पूर्णता प्रसंग)
विभिन्न लोक-परंपराओं में यह अटल मान्यता है कि किसी भी मुख्य व्रत कथा को सुनने के पश्चात 'तपसी और लपसी' (या विनायक जी) की छोटी सी लोक-कथा अवश्य सुननी चाहिए। मान्यता है कि यदि इस कथा को न सुना जाए, तो व्रत-कथा का पुण्य फल किसी अन्य को प्राप्त हो जाता है। अतः पारंपरिक वाचन में इसे कथा के अंत में अवश्य पढ़ा जाता है ।
तपसी और लपसी का विवाद
प्राचीन काल में दो व्यक्ति थे— एक का नाम था 'तपसी' और दूसरे का नाम था 'लपसी'। तपसी दिन-रात वन में बैठकर भगवान की घोर तपस्या करता रहता था। वहीं दूसरी ओर, लपसी नाम का व्यक्ति अत्यंत सरल था; वह रोज़ सवा सेर आटे और गुड़ की लापसी (हलवा जैसा प्रसाद) बनाता, भगवान को उसका भोग लगाता, घंटी बजाता और फिर प्रसन्नता से उसे स्वयं जीम (खा) लेता था ।
एक दिन उन दोनों में इस बात पर भयंकर विवाद और झगड़ा हो गया कि दोनों में से बड़ा और श्रेष्ठ भक्त कौन है। तपसी अहंकार में भरकर बोला— "मैं बड़ा हूँ, क्योंकि मैं रोज़ भगवान की इतनी कठोर तपस्या करता हूँ।" लपसी कहने लगा— "नहीं, मैं बड़ा हूँ, क्योंकि मैं रोज़ भगवान को सवा सेर की मीठी लापसी का भोग लगाता हूँ।" ।
जब दोनों आपस में झगड़ रहे थे, तभी देवर्षि नारद जी वीणा बजाते हुए वहाँ से गुज़रे। दोनों को झगड़ते देखकर नारद जी ने उनसे कारण पूछा। दोनों ने अपनी-अपनी बात नारद जी के समक्ष रख दी और उनसे न्याय करने को कहा ।
नारद जी मुस्कुराए और बोले— "तुम लोग आपस में झगड़ा मत करो। तुम में से कौन बड़ा भक्त है, इस बात का फैसला मैं कल सुबह कर दूँगा।" ।
नारद जी की परीक्षा और परिणाम
अगले दिन सुबह-सुबह तपसी और लपसी दोनों स्नान करके आ रहे थे। देवर्षि नारद जी ने उनकी परीक्षा लेने के लिए उन दोनों के रास्ते में सवा-सवा करोड़ की अत्यंत मूल्यवान हीरे की अंगूठियां रख दीं ।
जब तपसी वहाँ से गुज़रा और उसने वह अंगूठी देखी, तो वह रुक गया। इतनी कीमती अंगूठी देखकर उसके मन में भयंकर लालच आ गया। उसने तुरंत उस अंगूठी को उठा लिया और अपने पैर के नीचे छुपा लिया। वह मन ही मन सोचने लगा कि "यह तो बड़ी कीमती अंगूठी है, इसे बेचकर बहुत सारे पैसे मिलेंगे और उन पैसों से एक बहुत बड़ा यज्ञ करके मैं स्वयं को सबसे बड़ा साबित कर दूँगा।" ।
थोड़ी देर में नारद जी वहाँ पर आए। दोनों कहने लगे कि "बताओ नारद जी, हम दोनों में से कौन बड़ा है?" नारद जी बोले— "दोनों अपने-अपने स्थान पर खड़े हो जाओ।" दोनों खड़े हो गए। जैसे ही तपसी खड़ा हुआ, उसके पैर के नीचे से वह छुपाई हुई करोड़ की अंगूठी निकल कर सामने आ गई ।
नारद जी ने तपसी को फटकार लगाते हुए कहा— "रे तपसी! इतनी घोर तपस्या कर ली तूने, पर तेरे मन का लालच अभी तक नहीं गया। जा, अब तुझे तेरी तपस्या का भी कोई फल नहीं मिलेगा।" ।
यह सुनना था कि तपसी का अहंकार टूट गया और वह ज़ोर-ज़ोर से रोने लगा। वह रोते-रोते नारद जी के पैरों में गिर गया और विनती करने लगा— "महाराज! मुझ पर दया करो और बताओ कि मुझे मेरी इस जीवन भर की तपस्या का फल कैसे प्राप्त होगा?" ।
तब देवर्षि नारद जी ने एक व्यवस्था दी और बोले— "सुन तपसी! संसार में जो भी व्यक्ति अपने घर में गाय और कुत्ते की रोटी नहीं निकालेगा, उसकी तपस्या और व्रत का फल तुझे मिल जाएगा। जो संध्या के समय दीवा (दीपक) जलाकर भगवान के समक्ष हाथ नहीं जोड़ेगा, उसके पुण्य तुझे मिल जाएँगे। जो ब्राह्मण को भोजन कराकर दक्षिणा नहीं देगा, उसका फल तुझे मिल जाएगा। और सबसे मुख्य बात— जो कोई भी भक्त किसी भी व्रत की मुख्य सारी कथाएँ और कहानी कहकर अंत में तेरी (तपसी-लपसी की) यह कहानी नहीं कहेगा या नहीं सुनेगा, तब उसके व्रत के सारे पुण्य और सारे फल तुझे मिल जाएँगे।" ।
बस, देवर्षि नारद के इसी विधान के कारण, तभी से सभी व्रत कथा-कहानियों के साथ तपसी-लपसी की यह कहानी अनिवार्य रूप से सुनी जाती है, ताकि व्रत और कथा का संपूर्ण फल साधक को प्राप्त हो सके और किसी अन्य के पास न जाए ।
6. पारंपरिक उपसंहार एवं फलश्रुति (कथा का अंत)
सनातन हिंदू धर्म में किसी भी व्रत-कथा का वाचन तब तक पूर्ण नहीं माना जाता, जब तक कि कथा के अंत में उसकी 'फलश्रुति' (कथा श्रवण से प्राप्त होने वाले पुण्यों और लाभों का सविस्तार विवरण) का पूर्ण श्रद्धा से पाठ न किया जाए। पारंपरिक व्रत-पुस्तिकाओं और लोक-मान्यताओं में मंगलवार व्रत कथा के अंत में जो समापन वाक्य और फल-वचन कहे जाते हैं, वे अक्षुण्ण रूप से इस प्रकार हैं:
"जो भी मनुष्य (स्त्री अथवा पुरुष) पूर्ण श्रद्धा, भक्ति और नियमपूर्वक मंगलवार का यह व्रत रखता है और इस मंगलवार व्रत कथा को एकाग्र चित्त से पढ़ता या सुनता है, श्री संकटमोचन हनुमान जी महाराज की असीम कृपा से उसके जीवन के सब कष्ट तत्काल दूर हो जाते हैं ।
इस व्रत को करने और कथा सुनने से पवनपुत्र बजरंगबली अति शीघ्र प्रसन्न होते हैं और उस साधक पर अपनी निरंतर कृपा दृष्टि बरसाते हैं । उसे इस संसार के सर्व-सुख प्राप्त होते हैं तथा उसके मन की सभी सात्विक मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं ।
बजरंगबली की कृपा से व्यक्ति के भीतर बल, साहस, धैर्य और असीम आत्मविश्वास में वृद्धि होती है । जीवन में आने वाली सभी प्रकार की अकारण परेशानियों, गुप्त शत्रुओं के भय, गंभीर और असाध्य स्वास्थ्य समस्याओं (रोगों), तथा भारी ऋण (कर्ज) के भार से उसे सदैव के लिए मुक्ति मिल जाती है ।
जो निसंतान दंपत्ति इस व्रत का संकल्प लेकर कथा-श्रवण करते हैं, उन्हें श्री हनुमान जी के वरदान से सुयोग्य, तेजस्वी और आज्ञाकारी संतान की प्राप्ति होती है । पारिवारिक क्लेश सदा के लिए समाप्त हो जाते हैं और घर में सुख, शांति, वैभव और समृद्धि का स्थायी वास होता है । इसके अतिरिक्त, इस व्रत के प्रभाव से कुंडली में विद्यमान मंगल ग्रह के सभी अनिष्टकारी और अशुभ प्रभावों में स्वतः कमी आ जाती है ।
अंतिम प्रार्थना (क्षमा-याचना एवं मंगल-कामना):
हे परम कृपालु श्री हनुमान जी महाराज! हे संकटमोचन! हे अंजनीपुत्र! जिस प्रकार आपने उस वन में गए निःसंतान ब्राह्मण और उसकी पत्नी की पुकार सुनकर उन्हें 'मंगल' नामक तेजस्वी पुत्र प्रदान कर निहाल कर दिया ; जिस प्रकार आपने उस निर्धन और अनाथ वृद्धा माता की कठिन परीक्षा लेकर उसे और उसके पुत्र 'मंगलिया' को अचल सुख-संपत्ति का आशीर्वाद दिया ; और जिस प्रकार भगवान मंगलदेव ने अपनी अनन्य भक्त रत्नावली के मृत पति को जीवन-दान देकर उसका सौभाग्य अखंड किया ; ठीक उसी प्रकार, हे कृपानिधान! इस पवित्र कथा को कहने वाले, इस कथा को ध्यानपूर्वक सुनने वाले, तथा कथा के मध्य में हुँकारा भरने वाले सभी भक्तों पर अपनी कृपादृष्टि सदा-सर्वदा बनाए रखना ।
आप अपने सभी भक्तों के बड़े से बड़े संकटों का नाश करना। जो आपकी शरण में आ गया है, उसे जीवन में कभी निराश मत करना और सभी को सदा सुखमय, नीरोग तथा आनंदपूर्वक रखना।
बोलिए साक्षात् श्री हनुमान जी महाराज की जय!
बोलिए पवनपुत्र बजरंगबली की जय!
बोलिए ग्रहों के सेनापति मंगल देव की जय!
ओम नमः शिवाय! जय श्री राम!