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रमा एकादशी व्रत कथा: कार्तिक कृष्ण पक्ष की संपूर्ण पारंपरिक कथा

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रमा एकादशी व्रत कथा: पद्म पुराण अंतर्गत संपूर्ण एवं अक्षुण्ण पारंपरिक पाठ

पुराणों में वर्णित एकादशी व्रतों की पावन श्रृंखला में कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की 'रमा एकादशी' का अत्यंत विशिष्ट और परम कल्याणकारी स्थान है । पद्म पुराण के उत्तर खण्ड (अध्याय ६०) में वर्णित यह कथा साक्षात् भगवान श्रीकृष्ण और धर्मराज युधिष्ठिर के मध्य हुए पवित्र संवाद के रूप में संकलित है ।

परंपरागत रूप से रमा एकादशी के पावन अवसर पर जिस मूल और अक्षुण्ण कथा का पाठ किया जाता है, उसमें राजा मुचुकुंद की धर्मपरायणता, राजकुमार शोभन की विवशता, और सती चन्द्रभागा के व्रत-पुण्य के प्रभाव का अत्यंत विशद और अद्भुत वर्णन प्राप्त होता है । यह लेख उसी पौराणिक व्रत-कथा का पूर्ण, क्रमबद्ध और शुद्ध पारंपरिक प्रस्तुतीकरण है, जिसमें किसी भी प्रकार के कल्पित प्रसंग अथवा आधुनिक विश्लेषण का समावेश नहीं किया गया है ।

कथा के विस्तृत पाठ से पूर्व, इस पौराणिक आख्यान के मुख्य पात्रों का विवरण निम्नलिखित तालिका में प्रस्तुत है:

पात्र का नाम पौराणिक परिचय एवं कथा में भूमिका
धर्मराज युधिष्ठिर पाण्डुपुत्र; कथा के श्रोता, जिनके प्रश्न से रमा एकादशी का माहात्म्य प्रकट हुआ ।
भगवान श्रीकृष्ण देवकी-नंदन, परमेश्वर; कथा के वक्ता, जिन्होंने इस व्रत की महिमा और कथा का विस्तारपूर्वक वर्णन किया ।
राजा मुचुकुंद सत्यवादी, धर्मात्मा और विष्णुभक्त नृपश्रेष्ठ; देवराज इन्द्र, यम, वरुण, कुबेर और विभीषण के परम मित्र ।
चन्द्रभागा राजा मुचुकुंद की सुपुत्री; आठ वर्ष की आयु से नियमपूर्वक एकादशी व्रत करने वाली परम सती ।
राजकुमार शोभन राजा चन्द्रसेन के सुपुत्र और चन्द्रभागा के पति; शारीरिक रूप से दुर्बल, जिन्होंने रमा एकादशी के व्रत में प्राण त्यागे ।
सोमशर्मा राजा मुचुकुंद के राज्य के एक श्रेष्ठ और शुद्ध हृदय वाले ब्राह्मण; जिन्होंने तीर्थयात्रा के दौरान शोभन के दिव्य नगर को देखा ।
महर्षि वामदेव मंदराचल पर्वत के समीप निवास करने वाले महान तपस्वी ऋषि; जिन्होंने अपने मंत्र और सामान्य अर्घ्य से चन्द्रभागा की देह को दिव्य बनाया ।

१. पारंपरिक प्रारंभ: धर्मराज युधिष्ठिर और भगवान श्रीकृष्ण का पावन संवाद

नैमिषारण्य के पावन तीर्थ में सूतजी महाराज द्वारा शौनक आदि ऋषियों को सुनाई जा रही इस परम पवित्र कथा के अंतर्गत, द्वापर युग में पाण्डुपुत्र धर्मराज युधिष्ठिर ने तीनों लोकों के स्वामी, कमलनयन भगवान श्रीकृष्ण से हाथ जोड़कर अत्यंत विनम्र भाव से प्रश्न किया ।

युधिष्ठिर ने कहा— "हे जनार्दन! हे माधव! हे सर्वेश्वर! मैं आपके श्रीचरणों में बारंबार प्रणाम करता हूँ। हे प्रभो, मेरे मन में एकादशी व्रतों के विषय में जानने की तीव्र लालसा है। कृपा करके मेरे इस संशय का निवारण करें कि कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष में जो परम पवित्र एकादशी आती है, उसका क्या नाम है? उस पावन तिथि पर किस देवता का विधिपूर्वक पूजन किया जाता है? और उस उत्तम व्रत का पालन करने से प्राणी को किस पुण्य-फल की प्राप्ति होती है? हे जगन्नाथ, मेरे प्रति अपने स्नेह के कारण आप यह सम्पूर्ण विधान और महात्म्य विस्तारपूर्वक कहने की कृपा करें" ।

धर्मराज युधिष्ठिर के इन श्रद्धापूर्ण और धर्मयुक्त वचनों को सुनकर भक्तवत्सल भगवान श्रीकृष्ण अत्यंत प्रसन्न हुए。

श्रीकृष्ण ने मुस्कुराते हुए कहा— "हे राजन्! हे नृपश्रेष्ठ! तुमने सम्पूर्ण लोक के कल्याण के लिए बहुत ही उत्तम प्रश्न किया है। तुम मेरे अत्यंत प्रिय हो, इसलिए मैं तुम्हारे स्नेहवश इस एकादशी के महान रहस्य का वर्णन करता हूँ, तुम इसे एकाग्रचित्त होकर ध्यानपूर्वक श्रवण करो ।

हे कुंतीपुत्र! कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष में जो अत्यंत मंगलकारी और महापुण्यदायिनी एकादशी आती है, उसे 'रमा एकादशी' के नाम से जाना जाता है । यह रमा एकादशी प्राणी के बड़े-से-बड़े और घोर पापों का पूर्ण रूप से शमन करने वाली है । यह परम श्रेष्ठ एकादशी सांसारिक मनुष्यों के लिए 'चिन्तामणि' के समान उनकी समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाली है और स्वर्ग तथा मोक्ष की इच्छा रखने वालों के लिए 'कामधेनु' के समान अभीष्ट फल प्रदान करने वाली है ।

हे धर्मराज! इस परम पवित्र तिथि पर सर्व-पापहारी, शंख-चक्र-गदा-पद्म धारण करने वाले साक्षात् भगवान श्रीहरि (विष्णु) का ही विधि-विधान से पूजन किया जाता है । अब मैं तुम्हारे समक्ष इस रमा एकादशी की वह परम पावन और ऐतिहासिक कथा का वर्णन करता हूँ, जिसके श्रवण मात्र से मनुष्य के समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। ध्यानपूर्वक सुनो।" ।


२. मुख्य कथा: राजा मुचुकुंद, चन्द्रभागा और शोभन का पावन चरित्र

मुचुकुंद राजा का परिचय

भगवान श्रीकृष्ण ने कथा का आरंभ करते हुए कहा— हे राजन्! प्राचीन पौराणिक काल में मुचुकुंद नाम के एक अत्यंत प्रतापी, सत्यवादी, धर्मात्मा और न्यायप्रिय राजा राज्य करते थे । राजा मुचुकुंद महाराज मान्धाता के सुपुत्र थे । उनका प्रताप और वैभव इतना अधिक था कि तीनों लोकों में उनकी ख्याति फैली हुई थी। उनकी सत्यनिष्ठा और धर्मपरायणता के कारण स्वर्ग के अधिपति देवराज इन्द्र, मृत्यु के देवता यमराज, जल के देवता वरुण, धन के अधिपति कुबेर और लंकापति विभीषण जैसे दिग्गज उनके घनिष्ठ और परम मित्र थे ।

राजा मुचुकुंद भगवान श्रीहरि विष्णु के अनन्य और परम उपासक थे । उनके राज्य में सर्वत्र शांति, धर्म और न्याय का साम्राज्य था, और उनका शासन पूर्णतः निष्कंटक था । वे स्वयं एकादशी का व्रत बड़े ही कठोर नियमों के साथ और पूर्ण श्रद्धा-भाव से करते थे, और उनकी समस्त प्रजा भी धर्म के मार्ग पर चलते हुए सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करती थी ।

पुत्री चन्द्रभागा का परिचय और राजकुमार शोभन से विवाह

कालान्तर में, उन विष्णुभक्त राजा मुचुकुंद के राजमहल में एक अत्यंत रूपवती, गुणवान और सुलक्षणा कन्या का जन्म हुआ। वह कन्या पवित्र नदी के समान ही निर्मल और अत्यंत सुंदर थी, अतः राजा ने उसका नाम 'चन्द्रभागा' रखा ।

जब राजकुमारी चन्द्रभागा धीरे-धीरे बड़ी होकर विवाह योग्य हुई, तब राजा मुचुकुंद ने उसका विवाह राजा चन्द्रसेन के सुपुत्र, राजकुमार 'शोभन' के साथ अत्यंत विधि-विधान और धूमधाम से संपन्न कर दिया ।

एकादशी के दिन राजमहल का कठोर नियम

हे युधिष्ठिर! राजा मुचुकुंद के सम्पूर्ण राज्य में एकादशी के पावन व्रत को लेकर एक अत्यंत कठोर, अटूट और अपरिवर्तनीय नियम लागू था ।

उनके राज्य में एकादशी के दिन कोई भी प्राणी—चाहे वह राजा हो, प्रजा हो अथवा सेवक—भोजन या अन्न-जल ग्रहण नहीं कर सकता था । यह नियम केवल मनुष्यों तक ही सीमित नहीं था, अपितु राज्य के पशुओं पर भी अत्यंत कड़ाई से लागू होता था। एकादशी के दिन राज्य के हाथी, घोड़े, ऊंट, बिल्ली, और गौ आदि पशुओं को भी तृण (घास), अन्न, और जल आदि ग्रहण करने की तनिक भी अनुमति नहीं थी । सभी को पूर्ण रूप से निराहार रहकर भगवान का उपवास रखना पड़ता था。

शोभन का आगमन और चन्द्रभागा की चिंता

एक बार की बात है, राजकुमार शोभन अपनी प्रिय पत्नी चन्द्रभागा के साथ अपने श्वसुर राजा मुचुकुंद के राजमहल (ससुराल) में दर्शन हेतु आए हुए थे । संयोगवश, वह कार्तिक का ही महीना था और उसी समय महापुण्यदायिनी 'रमा एकादशी' की परम पावन तिथि निकट आ गई ।

दशमी तिथि के दिन ही राजा मुचुकुंद ने अपनी परंपरा के अनुसार सम्पूर्ण राज्य में बड़े-बड़े ढोल (नगाड़े) बजवाकर (डिंडिम घोष द्वारा) यह कठोर घोषणा करवा दी कि कल एकादशी है और राज्य का कोई भी जीव भोजन या जल ग्रहण नहीं करेगा ।

ढोल की यह भयंकर घोषणा सुनते ही राजकुमार शोभन के मन में अत्यंत चिंता और घबराहट उत्पन्न हो गई । राजकुमार शोभन शारीरिक रूप से अत्यंत दुर्बल हृदय के थे और वे एक प्रहर की भी भूख-प्यास सहन करने में सर्वथा असमर्थ थे ।

अपनी इस शारीरिक अक्षमता के कारण शोभन घबराकर तुरंत अपनी पत्नी चन्द्रभागा के पास गए और बोले— "हे प्रिये! सुंदर मुख वाली! अब मुझे क्या करना चाहिए? मैं किसी भी प्रकार से यह भूख सहन नहीं कर सकूँगा। तुम मुझे कोई ऐसा उचित उपाय बतलाओ जिससे मेरे प्राण बच सकें, क्योंकि यदि मैं कल उपवास करूँगा तो अवश्य ही मेरे प्राण चले जाएँगे" ।

चन्द्रभागा भी अपने पति की इस शारीरिक दुर्बलता और अपने पिता राजा मुचुकुंद के कठोर नियमों को भली-भांति जानती थी, अतः वह भी अत्यंत भयभीत और चिंतित हो उठी ।

चन्द्रभागा ने अपने पति को समझाते हुए कहा— "हे स्वामी! मेरे पिता के राज्य में एकादशी के दिन कोई भी प्राणी भोजन नहीं कर सकता। यहाँ तक कि हाथी, घोड़ा, ऊँट, बिल्ली और गौ आदि पशु भी तृण, अन्न और जल ग्रहण नहीं करते, फिर भला कोई मनुष्य कैसे भोजन कर सकता है? मेरे पिता के यहाँ तो सभी को व्रत करने की अत्यंत कठोर राजाज्ञा है। यदि आप किसी भी स्थिति में भोजन करना ही चाहते हैं, तो आपको अभी इसी समय किसी दूसरे स्थान (इस राज्य की सीमा से बाहर) चले जाना चाहिए। क्योंकि यदि आप यहाँ रहेंगे तो आपको राजाज्ञा मानकर अवश्य ही व्रत करना पड़ेगा, अन्यथा आप बहुत कष्ट पाएंगे" ।

शोभन का उपवास-पालन और देह-त्याग

अपनी पत्नी चन्द्रभागा की यह स्पष्ट और सत्य बात सुनकर राजकुमार शोभन ने मन ही मन विचार किया और दृढ़ निश्चय करते हुए कहा— "हे प्रिये! तुम्हारी यह राय सर्वथा उचित है, परंतु मैं केवल एकादशी का व्रत करने के डर से भागकर किसी दूसरे स्थान पर नहीं जाऊँगा। अब मैंने निर्णय लिया है कि मैं यहीं रहकर एकादशी के इस पवित्र व्रत का पालन अवश्य करूँगा। जो मेरे भाग्य में लिखा होगा, वह देखा जाएगा। परिणाम चाहे कुछ भी क्यों न हो, भाग्य के विधान को भला कौन टाल सकता है" ।

इस प्रकार अपने भाग्य पर निर्भर होकर और दृढ़ निश्चय करके राजकुमार शोभन ने रमा एकादशी के व्रत का पालन आरंभ कर दिया ।

परंतु जैसे-जैसे दिन बीतने लगा, शोभन भूख और प्यास से अत्यंत व्याकुल और पीड़ित होने लगे । भगवान सूर्यनारायण अस्ताचल को चले गए और वैष्णवों को अत्यंत हर्ष प्रदान करने वाली तथा श्रीहरि के जागरण की रात्रि आ गई ।

परंतु वह जागरण की रात शोभन के लिए अत्यंत कष्टकारी और असहनीय दुख देने वाली सिद्ध हुई । भूख और प्यास की अधिकता के कारण रात भर उन्हें भयंकर वेदना सहनी पड़ी। जब अगले दिन (द्वादशी तिथि को) प्रातःकाल सूर्योदय का समय समीप आया, उससे पूर्व ही भूख और प्यास से तड़पते हुए राजकुमार शोभन के प्राण-पखेरू उड़ गए और उन्होंने अपना शरीर त्याग दिया ।

शोभन की मृत्यु से राजमहल में भयंकर शोक छा गया। राजा मुचुकुंद ने अपने दामाद शोभन के मृत शरीर को राजसी सम्मान के साथ जल-प्रवाह कराकर उनका अंतिम संस्कार संपन्न किया । तत्पश्चात, जब चन्द्रभागा अपने पति के साथ सती होने के लिए उद्यत हुई, तब राजा मुचुकुंद ने अपनी पुत्री को रोक दिया और आज्ञा दी कि वह सती न हो, अपितु भगवान श्रीहरि विष्णु की कृपा पर पूर्ण भरोसा रखे । अपने पिता की आज्ञानुसार चन्द्रभागा सती नहीं हुई और अपने पिता के घर पर ही रहकर आजीवन अत्यंत नियमपूर्वक भगवान विष्णु की भक्ति और एकादशी के व्रतों का पालन करने लगी ।

दिव्य लोक में राज्य की प्राप्ति

हे धर्मराज युधिष्ठिर! उधर राजकुमार शोभन ने यद्यपि यह एकादशी व्रत विवशता में और बिना दृढ़ श्रद्धा के (केवल परिस्थितियों के कारण) किया था, तथापि रमा एकादशी के व्रत के अपूर्व प्रभाव और महापुण्य से उन्हें एक महान और दिव्य फल की प्राप्ति हुई ।

जल-प्रवाह के पश्चात भगवान विष्णु की असीम कृपा और एकादशी के प्रताप से शोभन को मंदराचल पर्वत के उच्च शिखर पर 'देवपुर' नामक एक अत्यंत भव्य, रत्नजड़ित और वैभवशाली दिव्य नगर की प्राप्ति हुई । रमा एकादशी के पुण्य-प्रताप से शोभन उस अनुपम और समृद्धशाली नगरी के राजा बन गए ।

उनका वह नव-प्राप्त राज्य स्वर्ण और अमूल्य मणियों से सुसज्जित था। वहाँ असंख्य गंधर्व और अप्सराएँ उनकी सेवा में निरंतर उपस्थित रहते थे। उस दिव्य राजसिंहासन पर बैठे हुए राजकुमार शोभन दूसरे देवराज इन्द्र के समान ही अत्यंत सुशोभित और ऐश्वर्यवान प्रतीत होते थे ।

परंतु, चूँकि शोभन ने एकादशी का वह महाव्रत पूर्ण श्रद्धा और विश्वास के साथ नहीं किया था, अतः उनका वह भव्य नगर और राज्य स्थिर (स्थायी) नहीं था; वह पूर्णतः अस्थिर प्रकृति का था ।

सोमशर्मा का आगमन और शोभन से संवाद

कुछ समय पश्चात, राजा मुचुकुंद के राज्य का 'सोमशर्मा' नामक एक श्रेष्ठ और शुद्ध हृदय वाला ब्राह्मण विभिन्न तीर्थों की यात्रा करता हुआ उसी मंदराचल पर्वत के समीप जा पहुँचा ।

घूमते-घूमते उस ब्राह्मण ने उस दिव्य नगरी 'देवपुर' को देखा और वहाँ राजसिंहासन पर विराजमान राजा शोभन को पहचान लिया कि यह तो हमारे राजा मुचुकुंद के ही दामाद हैं ।

ब्राह्मण को अपनी ओर आते देखकर राजा शोभन अत्यंत प्रसन्न हुए। वे तुरंत अपने राजसिंहासन से उठ खड़े हुए और आगे बढ़कर ब्राह्मण सोमशर्मा का विधिपूर्वक स्वागत-सत्कार किया । शोभन ने ब्राह्मण को प्रणाम कर अपने श्वसुर राजा मुचुकुंद और अपनी प्रिय पत्नी चन्द्रभागा की कुशल-क्षेम पूछी ।

सोमशर्मा ब्राह्मण ने उत्तर दिया— "हे राजन्! आपके श्वसुर राजा मुचुकुंद और आपकी पत्नी चन्द्रभागा सहित राज्य में सब कुशल-मंगल है। परंतु हे नृपश्रेष्ठ! मुझे यह देखकर अत्यंत आश्चर्य हो रहा है कि आपने ऐसा अनुपम, इन्द्रपुरी के समान सुशोभित और विचित्र नगर कैसे प्राप्त कर लिया? कृपया इस रहस्य को मुझे बतलाएँ।" ।

शोभन ने विस्तारपूर्वक उत्तर देते हुए कहा— "हे द्विजेंद्र! यह सब कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की 'रमा एकादशी' के महान व्रत का ही प्रभाव है। यद्यपि मैंने वह व्रत बिना श्रद्धा के और विवशता में किया था, फिर भी मुझे इस दिव्य नगर की प्राप्ति हुई है। परंतु श्रद्धा के अभाव के कारण मेरा यह सुंदर नगर अस्थिर (अस्थायी) है ।

हे श्रेष्ठ ब्राह्मण! आप मुझ पर कृपा करें और कोई ऐसा उपाय बतलाएँ जिससे मेरा यह नगर और मेरा राज्य स्थायी और स्थिर हो जाए। आप मुचुकुंदपुर जाकर मेरी पत्नी चन्द्रभागा को मेरे इस नगर और मेरी स्थिति का सारा वृत्तांत अवश्य सुनाएँ। मुझे पूर्ण विश्वास है कि यदि आप जैसे शुद्ध हृदय वाले ब्राह्मण उसे यह कथा सुनाएँगे, तो वह अवश्य ही इस नगर को स्थिर कर देगी" ।

चन्द्रभागा को समाचार और तपस्वी वामदेव से मार्गदर्शन

शोभन की यह करबद्ध प्रार्थना सुनकर ब्राह्मण सोमशर्मा तुरंत वहाँ से प्रस्थान कर अपने नगर (मुचुकुंदपुर) लौट आए ।

वहाँ आकर उन्होंने चन्द्रभागा के समक्ष उपस्थित होकर उसे सारा वृत्तांत विस्तारपूर्वक कह सुनाया ।

सोमशर्मा बोले— "हे शुभे! मैंने मंदराचल पर्वत पर तुम्हारे पति शोभन को साक्षात् देखा है और उनके इन्द्रपुरी जैसे भव्य परंतु अस्थिर नगर का भी दर्शन किया है। उन्होंने प्रार्थना की है कि तुम अपने पुण्यों से उस नगर को स्थिर बनाओ" ।

अपने मृत पति के जीवित होने और उन्हें दिव्य राज्य प्राप्त होने का यह समाचार सुनकर चन्द्रभागा अत्यंत विस्मित और हर्षित हो उठी ।

चन्द्रभागा ने गद्गद होकर कहा— "हे ब्रह्मर्षे! क्या आपने जो देखा है वह कोई स्वप्न है या सत्य? मेरे मन में अपने पति के दर्शन की तीव्र लालसा उत्पन्न हो गई है। आप मुझे शीघ्र अति शीघ्र उनके पास ले चलें। मैं अपने जीवन भर के व्रतों के पुण्यों के प्रभाव से उनके उस नगर को अवश्य ही स्थिर कर दूँगी। कृपया आप हमारा पुनर्मिलन करवाएँ, इससे आपको भी महान पुण्य की प्राप्ति होगी" ।

चन्द्रभागा की यह दृढ़ निष्ठा और पवित्र इच्छा देखकर सोमशर्मा ब्राह्मण उसे अपने साथ लेकर मंदराचल पर्वत के समीप महर्षि 'वामदेव' के पवित्र आश्रम में पहुँचे ।

महर्षि वामदेव ने चन्द्रभागा और ब्राह्मण सोमशर्मा की पूरी कथा ध्यानपूर्वक सुनी । तत्पश्चात, महर्षि वामदेव ने अपने आश्रम में पवित्र वेद मंत्रों का सस्वर उच्चारण किया और अपने 'सामान्य अर्घ्य' (पवित्र जल) से चन्द्रभागा का अभिषेक किया । महान ऋषि के मंत्रों के अपूर्व प्रभाव और चन्द्रभागा द्वारा आजन्म किए गए एकादशी व्रतों के महान प्रताप से उसका भौतिक शरीर पूर्णतः दिव्य, अलौकिक और चिन्मय हो गया। वह दिव्य गति को प्राप्त हो गई ।

पुनः एकादशी-व्रत का पालन, व्रत-फल से दिव्य राज्य की स्थिरता और पुनर्मिलन

दिव्य और चिन्मय शरीर धारण करने के उपरांत चन्द्रभागा अत्यंत प्रसन्नता के साथ मंदराचल पर्वत पर स्थित अपने पति शोभन के उस देवपुर राजमहल की ओर अग्रसर हुई ।

अपनी प्रिय पत्नी चन्द्रभागा को अपनी ओर आते देखकर राजा शोभन अत्यंत हर्षित हुए और प्रसन्नता से अभिभूत होकर उसे पुकारते हुए आगे आए । उन्होंने अपनी पत्नी का भव्य स्वागत किया और अत्यंत आदरपूर्वक उसे अपने राजसिंहासन पर अपने वामांग (बाईं ओर) में बैठा लिया ।

तत्पश्चात, चन्द्रभागा ने अपने पति से अत्यंत मधुर और दृढ़ वाणी में कहा— "हे प्राणनाथ! अब आप मेरे द्वारा संचित किए गए महान पुण्यों को ग्रहण कीजिए। जब मैं केवल आठ वर्ष की थी, तब से लेकर आज तक मैंने अपने पिता के घर में पूर्ण नियम, विधि-विधान और दृढ़ श्रद्धा के साथ एकादशी के व्रतों का पालन किया है । मेरे द्वारा संचित उन समस्त एकादशी व्रतों के अमोघ पुण्य-प्रताप को मैं आपको अर्पित करती हूँ। इस पुण्य के प्रभाव से आपका यह दिव्य नगर और राज्य अब पूर्णतः स्थिर हो जाएगा। यह समस्त सिद्धियों और ऐश्वर्यों से युक्त होकर प्रलय के अंत तक (कल्प के अंत तक) इसी प्रकार शाश्वत और अचल रहेगा" ।

इस प्रकार, अपनी पतिव्रता पत्नी चन्द्रभागा द्वारा आजीवन किए गए रमा एकादशी एवं अन्य एकादशियों के व्रतों के महान पुण्य को प्राप्त कर राजा शोभन का वह अस्थिर राज्य पूर्णतः स्थिर और शाश्वत हो गया । चन्द्रभागा भी दिव्य आभूषणों और वस्त्रों से सुसज्जित होकर अपने पति राजा शोभन के साथ उस दिव्य देवपुर नगर में अनंत काल तक आनंदपूर्वक जीवन व्यतीत करने लगी ।

रमा एकादशी व्रत-कथा के इस सम्पूर्ण घटनाक्रम को निम्नलिखित तालिका के माध्यम से संक्षेपित रूप में समझा जा सकता है:

कथा-क्रम घटना का विवरण
१. उद्घोषणा राजा मुचुकुंद द्वारा दशमी तिथि को एकादशी व्रत के कठोर पालन (पशुओं सहित) की राजाज्ञा ।
२. शोभन का उपवास दुर्बल राजकुमार शोभन द्वारा विवशतावश व्रत-पालन, रात्रि जागरण और असहनीय पीड़ा ।
३. देह-त्याग द्वादशी के सूर्योदय से पूर्व शोभन का प्राण-त्याग और जल-प्रवाह ।
४. दिव्य फल व्रत के प्रभाव से शोभन को मंदराचल पर भव्य किन्तु अस्थिर 'देवपुर' नगर की प्राप्ति ।
५. संदेश का आदान-प्रदान ब्राह्मण सोमशर्मा का मंदराचल गमन, शोभन से भेंट और चन्द्रभागा को समाचार देना ।
६. वामदेव ऋषि का अनुग्रह चन्द्रभागा का महर्षि वामदेव के आश्रम गमन, मंत्र और अर्घ्य से दिव्य देह की प्राप्ति ।
७. राज्य की स्थिरता चन्द्रभागा द्वारा आठ वर्ष की आयु से संचित एकादशी पुण्यों का पति को समर्पण और राज्य का प्रलयकाल तक स्थिर होना ।

३. पारंपरिक फल-वचन (फलश्रुति)

कथा के पूर्ण होने पर, सम्पूर्ण व्रतों के अधिष्ठाता भगवान श्रीकृष्ण ने धर्मराज युधिष्ठिर से कहा— "हे राजन्! हे नृपश्रेष्ठ! मैंने तुम्हारे समक्ष कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की महापुण्यदायिनी 'रमा' नामक एकादशी के इस अद्भुत और पापनाशक माहात्म्य का पूर्ण रूप से वर्णन किया है ।

हे धर्मराज! मैंने दोनों पक्षों (कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष) की एकादशी व्रतों का समान माहात्म्य बताया है। जैसी कृष्ण पक्ष की एकादशी होती है, वैसी ही पूर्ण फलदायी शुक्ल पक्ष की भी एकादशी होती है। इनमें किसी भी प्रकार का कोई भेद नहीं करना चाहिए। जिस प्रकार एक सफेद रंग की गाय हो या काले रंग की गाय हो, दोनों ही गायों का दूध एक समान ही पौष्टिक और श्वेत होता है; ठीक उसी प्रकार कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष दोनों ही पक्षों की एकादशियाँ प्राणी को समान रूप से महान पुण्य फल प्रदान करने वाली होती हैं ।

जो भी मनुष्य पूर्ण श्रद्धा और विश्वास के साथ इस 'रमा एकादशी' का व्रत करता है, उसके ब्रह्महत्या आदि समस्त महापाप समूल नष्ट हो जाते हैं ।

जो कोई भी मनुष्य इस रमा एकादशी व्रत के माहात्म्य और इस पावन कथा को भक्तिपूर्वक पढ़ता है अथवा एकाग्रचित्त होकर श्रवण करता है, वह मनुष्य अपने जीवन के समस्त पापों और बंधनों से पूर्णतः मुक्त होकर अंतकाल में साक्षात् भगवान श्रीहरि विष्णु के परमधाम (वैकुंठ लोक) को प्राप्त होता है और वहाँ प्रतिष्ठित होकर अक्षय आनंद का भागी बनता है" ।

पारंपरिक फल-वचन का आधार प्राप्त होने वाला पुण्य-फल
रमा एकादशी व्रत का पालन ब्रह्महत्या आदि समस्त महापापों का समूल नाश ।
कथा का श्रवण अथवा पठन समस्त पापों से मुक्ति, सहस्र गोदान का पुण्य और अंतकाल में विष्णुलोक (वैकुंठ) की प्राप्ति ।
कृष्ण एवं शुक्ल पक्ष की समानता दोनों पक्षों की एकादशी (श्वेत और कृष्ण गौ के समान) समान पुण्य-फल प्रदाता ।
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