विस्तृत उत्तर
आरती की शास्त्रोक्त विधि अग्नि पुराण और स्कंद पुराण में विस्तार से वर्णित है:
आरती का अर्थ
आरती' = 'आ-रत्री' अर्थात् रात्रि के अंधकार को दूर करना। या 'आर्तिका' — कष्टों को दूर करना। आरती में दीप की ज्योति से देवता को नीराजन (प्रकाश अर्पण) किया जाता है।
आरती के प्रकार
- 1पंचमुखी आरती — 5 बत्तियों का दीप — सर्वोत्तम
- 2एकमुखी आरती — 1 बत्ती — नित्य पूजा के लिए
- 3सप्तमुखी आरती — 7 बत्तियाँ — विशेष अवसर
- 4नीराजन — कपूर से आरती — अत्यंत शुभ
आरती सामग्री
- ▸पीतल या चाँदी की थाली
- ▸घी या तेल का दीप
- ▸कपूर
- ▸शंख, घंटी
- ▸चमर (पंखा)
- ▸आरती थाली में फूल, अक्षत
आरती की क्रमिक विधि
1दीप तैयार करें
घी की रुई की बत्ती। पंचमुखी दीप — पाँचों बत्तियाँ जलाएं। पंचमुखी दीप पंच तत्वों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) का प्रतीक है।
2शंख और घंटी बजाएं
आरती से पहले शंख और घंटी बजाएं — इससे नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है।
3आरती उतारने का क्रम
देवता के चरणों से आरंभ करके ऊपर की ओर जाएं:
- ▸चरणों पर — 4 बार
- ▸नाभि पर — 2 बार
- ▸मुख पर — 1 बार
- ▸पूरे शरीर पर — 7 बार
4दिशा
दीप को हमेशा दक्षिणावर्त (clockwise) घुमाएं। यह सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक है।
5आरती का गान
आरती उतारते समय देवता की स्तुति गाएं:
- ▸शिव: 'ॐ जय शिव ओंकारा...'
- ▸विष्णु: 'ॐ जय जगदीश हरे...'
- ▸लक्ष्मी: 'ॐ जय लक्ष्मी माता...'
- ▸हनुमान: 'जय हनुमान ज्ञान गुण सागर...'
- ▸गणेश: 'जय गणेश जय गणेश देवा...'
6कपूर आरती
दीप आरती के बाद कपूर जलाकर आरती करें। कपूर का धुआँ वातावरण को शुद्ध करता है।
7आरती का प्रसाद
आरती की लौ को दोनों हाथों से स्पर्श करके नेत्रों और मस्तक से लगाएं — इसे 'नीराजन ग्रहण' कहते हैं।
अग्नि पुराण का वचन
दीपेन नीराजयते यः स पापान्मुच्यते नरः।' — जो दीप से नीराजन (आरती) करता है, वह पापों से मुक्त होता है।





