विस्तृत उत्तर
यह प्रश्न हर युग में मनुष्य के मन में उठा है। अर्जुन ने भी भगवान श्रीकृष्ण से यही पूछा था। हिंदू धर्म इसका उत्तर कर्म और प्रारब्ध के सिद्धांत के माध्यम से देता है।
भगवद्गीता में श्रीकृष्ण ने स्पष्ट कहा है कि प्रत्येक जीव को उसके कर्मों का फल अवश्य मिलता है, लेकिन यह फल हमेशा इसी जन्म में और तुरंत नहीं मिलता। हमारे कर्म तीन प्रकार के होते हैं — संचित, प्रारब्ध और क्रियमाण। संचित कर्म वे हैं जो अनेक जन्मों में एकत्र हुए हैं; प्रारब्ध वे हैं जो इस जन्म में भोगने के लिए निर्धारित हो चुके हैं; और क्रियमाण वे हैं जो हम अभी कर रहे हैं।
जो व्यक्ति इस जन्म में बहुत अच्छा है, वह पिछले जन्मों के किसी प्रारब्ध को भोग रहा हो सकता है। यह वैसा ही है जैसे किसी ने पहले गलती की, फसल बोई — उसे इस जन्म में काटना पड़ रहा है। लेकिन उसके वर्तमान के अच्छे कर्म उसके भविष्य का निर्माण कर रहे हैं।
एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि कभी-कभी दुख वास्तव में भगवान की कृपा होती है। जैसे सोने को कुंदन बनाने के लिए अग्नि से गुजरना पड़ता है, वैसे ही अच्छे लोग कठिनाइयों में परिष्कृत होते हैं। प्रह्लाद को भारी यातनाएँ मिलीं, पांडवों ने वनवास भोगा, सीता माता को अग्नि परीक्षा देनी पड़ी — परंतु ये सभी धर्म के पक्षधर थे।
इसके अलावा यह भी संभव है कि जो बुरा दिख रहा है, वह वास्तव में भगवान की योजना में एक बड़े शुभ का हिस्सा हो जिसे हम तुरंत नहीं समझ पाते। शास्त्रों में कहा गया है — 'यथा धेनुसहस्रेषु वत्सो विन्दति मातरम्, तथा पूर्वकृतं कर्म कर्तारमनुगच्छति' — अर्थात जैसे हजार गायों के झुंड में भी बछड़ा अपनी माँ को ढूंढ लेता है, उसी प्रकार पूर्व का किया कर्म अपने कर्ता को खोज लेता है।





