विस्तृत उत्तर
अघोरास्त्र स्तोत्र में स्पष्ट रूप से स्तम्भन, मोहन, वश्याकर्षण, उच्चाटन, कीलन और द्वेषण का उल्लेख है।
जब कोई शत्रु इन उग्र कर्मों का प्रयोग साधक के विरुद्ध करता है, तो स्तोत्र में निहित शक्ति इन 'श्री महादेव निर्मित' कर्मों को 'दह छिंदी छिंदी' (जलाकर और काटकर) ध्वस्त कर देती है।
इति कर्माण वृत्त फट् स्वाहा' (इस प्रकार कर्मों के समूह को ध्वस्त करो) यह दर्शाता है कि स्तोत्र का प्राथमिक लक्ष्य साधक को नकारात्मक तांत्रिक प्रयोगों से बचाना और उन्हें विखंडित करना है।





