विस्तृत उत्तर
संसार में मानव जीवन की आवश्यकताएँ केवल मुद्रा या स्वर्ण तक सीमित नहीं हैं। एक व्यक्ति जिसके पास अपार धन है, परंतु वह रुग्ण है, तो वह धन उसके लिए व्यर्थ है। यदि धन है परंतु संतान या साहस नहीं है, तो भी वह संपत्ति अपूर्ण है।
इसी सर्वांगीण विकास को ध्यान में रखते हुए, शास्त्रों और पुराणों में देवी लक्ष्मी के आठ विशिष्ट रूपों (अष्टलक्ष्मी) का विशद वर्णन किया गया है, जो मानव जीवन के आठ विभिन्न आयामों को पूर्णता प्रदान करते हैं।
अष्टलक्ष्मी साधना का दार्शनिक अभिप्राय यह है कि भौतिक धन (धनलक्ष्मी) भी तभी सार्थक है जब व्यक्ति के पास उसे सुचारू रूप से संभालने और समाज के हित में लगाने के लिए प्रखर बुद्धि (विद्यालक्ष्मी) हो। जब संकट आएं तो उनसे बिना विचलित हुए लड़ने का साहस (वीरलक्ष्मी और धैर्यालक्ष्मी) हो, और अंततः उस ऐश्वर्य का उपभोग करने के लिए उत्तम स्वास्थ्य, आरोग्य तथा एक संस्कारवान परिवार (संतानलक्ष्मी) हो। एकांगी धन मनुष्य को भ्रष्ट कर सकता है, परंतु अष्टलक्ष्मी का समग्र आशीर्वाद मनुष्य को पूर्णत्व की ओर ले जाता है।





