विस्तृत उत्तर
यह अत्यंत संवेदनशील और महत्वपूर्ण प्रश्न है। ईमानदारी से दोनों पक्ष प्रस्तुत:
परंपरागत मत
गरुड़ पुराण (प्रेतखंड अध्याय 8) — पुत्र, पौत्र, भाई को प्राथमिकता। बेटी/पत्नी = तभी जब कोई पुरुष संबंधी उपलब्ध न हो।
महत्वपूर्ण शास्त्रीय तथ्य (web-verified)
TV9 Hindi (गरुड़ पुराण विश्लेषण) — 'शास्त्रों में कहीं भी महिलाओं को अंतिम संस्कार करने से वर्जित नहीं किया गया है। महिलाओं को श्मशान नहीं जाने देना = सामाजिक परंपरा है, धार्मिक नियम नहीं।'
आधुनिक दृष्टिकोण
- 1कानूनी अधिकार — भारतीय कानून में बेटी और बेटा समान उत्तराधिकारी (हिंदू उत्तराधिकार संशोधन 2005)।
- 2सामाजिक परिवर्तन — अनेक प्रगतिशील परिवारों में बेटियां अंतिम संस्कार करती हैं — पूजा का फल उन्हें प्राप्त होता है।
- 3तर्क — यदि बेटी पिता का ऋण चुकाने योग्य है (सेवा, देखभाल) तो अंतिम संस्कार में भी योग्य।
- 4अनेक उदाहरण — कई प्रसिद्ध लोगों की बेटियों ने अंतिम संस्कार किया है।
सार: हाँ — बेटी माता-पिता का दाह संस्कार कर सकती है। शास्त्रों में स्पष्ट वर्जना नहीं — केवल प्राथमिकता क्रम दिया गया (पुत्र पहले)। पुत्र न हो या अनुपस्थित हो तो बेटी पूर्ण अधिकार रखती है। आधुनिक समाज में बेटी = बेटा — यह धार्मिक और सामाजिक दोनों दृष्टि से स्वीकार्य होता जा रहा है।





