विस्तृत उत्तर
भक्ति में आँसू आना — यह उस अवस्था का चिह्न है जहाँ हृदय और भगवान के बीच की दूरी मिटने लगती है। शास्त्रों और संतों ने इसे बहुत ऊँचा स्थान दिया है।
नवधा भक्ति में — भागवत में वर्णित नवधा भक्ति के अंतर्गत 'भाव' की अवस्था में नेत्रों से जल बहना एक लक्षण है। इसे 'अष्टसात्विक भाव' में शामिल किया गया है — जो भक्ति की गहराई के स्वतः उठने वाले शारीरिक-मानसिक लक्षण हैं।
चैतन्य महाप्रभु का अनुभव — भगवान चैतन्य महाप्रभु इतनी तीव्र भक्ति में रोते थे कि उनके आँसुओं से मार्ग भीग जाता था। उन्होंने इसे 'प्रेमाश्रु' कहा — प्रेम के आँसू।
क्यों आते हैं ये आँसू — जब भगवान के प्रति अपनी दूरी और उनकी करुणा एक साथ अनुभव हो; जब भजन-कीर्तन में भगवान की कोई लीला या स्मृति मन को भिगो दे; जब दुख में ईश्वर ही एकमात्र सहारा लगे और हृदय उमड़ पड़े — तब ये आँसू निकलते हैं।
यह कमजोरी नहीं — समाज में रोना कमजोरी माना जाता है, परंतु भक्ति में आँसू हृदय की कठोरता पिघलने का प्रमाण हैं। अहंकार जब गलता है तो आँसू बनकर बहता है।
सुरदास का वचन — 'अखियाँ हरि दर्शन की प्यासी' — आँखें हरि के दर्शन के लिए प्यासी हैं। यह प्यास जब तीव्र हो तो आँसू बनती है।
शुद्ध करते हैं — ये आँसू मन को हल्का और शुद्ध करते हैं। इनके बाद मन में एक अजीब सी शांति आती है — जो सामान्य रोने के बाद नहीं आती।





