विस्तृत उत्तर
अहंकार — 'मैं' की भावना — भक्ति का सबसे बड़ा शत्रु है। समस्त आध्यात्मिक परंपराओं में अहंकार के विसर्जन को मोक्ष और भक्ति की पहली शर्त माना गया है।
अहंकार भक्ति में इस प्रकार बाधक होता है —
पहला — अहंकार से समर्पण नहीं होता। जब हम 'मैं' को सबसे बड़ा मानते हैं तो भगवान के आगे झुकना कठिन लगता है। भक्ति का मूल है — 'तुम बड़े हो, मैं छोटा हूँ' — यह भाव अहंकार के रहते संभव नहीं।
दूसरा — अहंकार से भगवान के साथ संबंध बनता ही नहीं। जब जीव अपने आप को स्वतंत्र, स्वावलंबी और सर्वसमर्थ समझे, तो उसे भगवान की आवश्यकता ही नहीं लगती।
तीसरा — अहंकार कर्ता-बुद्धि उत्पन्न करता है। 'मैं करता हूँ, मैं भोगता हूँ' — यह भाव भगवान को अपने कर्मों का फल अर्पित करने में बाधा देता है।
रामानुजाचार्य के विशिष्टाद्वैत दर्शन में अहं-त्याग को भगवत्-प्राप्ति की पूर्वशर्त माना गया है। 'प्रपत्ति' — पूर्ण शरणागति — का अर्थ ही है अपने अहंकार का पूर्ण विसर्जन।
भगवान श्रीकृष्ण ने गीता (16.4) में अहंकार को आसुरी गुणों में रखा है। मीराबाई ने कहा — 'मेरे तो गिरधर गोपाल दूजो न कोई' — यह अहंकार-विसर्जन की पराकाष्ठा है।
अहंकार मिटाने का व्यावहारिक उपाय है — नित्य नाम-जप, सेवा-भाव और 'मैं नहीं, भगवान ही करते हैं' — यह भाव जीवन में उतारना।





