विस्तृत उत्तर
छिन्नमस्ता साधना — स्वयं के अहंकार की बलि और कुण्डलिनी-शक्ति का जागरण:
छिन्नमस्ता का परिचय
दशमहाविद्याओं में षष्ठ। 'छिन्न' = कटी, 'मस्ता' = सिर। स्वयं का सिर काटकर उसी सिर में रक्त-धारा पान करती देवी। यह 'आत्म-बलिदान' का तांत्रिक प्रतीक है — 'मैं' (अहंकार) का विसर्जन।
छिन्नमस्ता का तात्विक अर्थ
शाक्त प्रमोद: छिन्नमस्ता = कुण्डलिनी का उच्चतम प्रतीक। तीन रक्त-धाराएं = इड़ा, पिंगला, और सुषुम्ना। सिर = सहस्रार। स्वयं का सिर = अहंकार का अंत।
छिन्नमस्ता-साधना की विधि
1मंत्र
'श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं वज्रवैरोचनीये ह्रीं ह्रीं फट् स्वाहा'
— गुरु-दत्त और दीक्षा के बाद ही।
2काल
- ▸मंगलवार, अमावस्या
- ▸अर्धरात्रि
3वस्त्र
लाल वस्त्र — रक्त-रंग, तेज का प्रतीक।
4ध्यान-स्वरूप (छिन्नमस्ता तंत्र)
रक्तवर्णा, स्वयं-छिन्न-सिर-धारिणी, तीन रक्त-धाराएं, दो योगिनियों (जया और विजया) के साथ, कमल पर रति-कामदेव के ऊपर आसीन — ध्यान।
5पुरश्चरण
छिन्नमस्ता मंत्र (अक्षर-संख्या × 1 लाख) — गुरु-निर्देशित।
6भोग
लाल गुड़हल, लाल चावल, खीर।
छिन्नमस्ता-साधना का फल
- ▸कुण्डलिनी-जागरण — सर्वोच्च
- ▸अहंकार का पूर्ण विसर्जन
- ▸असाधारण शारीरिक और मानसिक शक्ति
- ▸शत्रु-नाश और रक्षा
विशेष चेतावनी
छिन्नमस्ता अत्यंत उग्र देवी हैं। यह साधना सामान्य साधकों के लिए नहीं — केवल उन्नत तांत्रिकों के लिए जो वर्षों की साधना और दीक्षा से तैयार हों। बिना गुरु के यह साधना न करें।
