विस्तृत उत्तर
ध्यान के लिए उचित स्थान और वातावरण का विस्तृत वर्णन शास्त्रों में मिलता है।
भगवद्गीता (6.11-12): 'शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः। नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम्।' — शुद्ध, एकांत स्थान पर, न अत्यधिक ऊँचे न नीचे आसन पर बैठें।
हठयोग प्रदीपिका (1.12-13) — आदर्श स्थान के लक्षण
- 1एकांत और शांत
- 2न अत्यधिक ठंडा, न गर्म
- 3साफ और स्वच्छ
- 4न बहुत ऊँचाई, न समुद्र तट के निकट
- 5नदी किनारा, वन, गुफा — उत्तम
शिव संहिता: नदी-संगम, पर्वत-शिखर, एकांत वन, और देवालय — ये चार स्थान ध्यान के लिए सर्वश्रेष्ठ।
गृहस्थ साधकों के लिए
- ▸पूजा कक्ष या स्थायी ध्यान-कक्ष
- ▸पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख
- ▸सुगंधित वातावरण (अगरबत्ती, धूप)
- ▸तुलसी या पीपल के पास का स्थान
शाश्वत सिद्धांत: मन शुद्ध हो तो बाहरी वातावरण गौण हो जाता है — अंततः ध्यान आंतरिक है।





