विस्तृत उत्तर
भगवद्गीता के 18 अध्याय, 700 श्लोक और प्रत्येक अध्याय एक 'योग' कहलाता है। तीन खंडों में विभाजित — कर्म (1-6), भक्ति (7-12), ज्ञान (13-18)।
18 अध्यायों का सारांश
- 1अर्जुन विषाद योग — अर्जुन का युद्धभूमि में शोक, मोह और कर्तव्य संकट। समस्या का प्रस्तुतीकरण।
- 1सांख्य योग — आत्मा की अमरता, कर्म योग का परिचय। 'कर्मण्येवाधिकारस्ते' (2.47)। गीता का मूल दर्शन।
- 1कर्म योग — निष्काम कर्म का विस्तृत वर्णन। कर्म न करना संभव नहीं, अतः निष्काम भाव से करो।
- 1ज्ञान कर्म संन्यास योग — दिव्य ज्ञान, अवतार सिद्धांत ('यदा यदा हि धर्मस्य' 4.7), ज्ञान से कर्म बंधन कटता है।
- 1कर्म संन्यास योग — संन्यास और कर्म योग की तुलना। दोनों एक ही गंतव्य पर ले जाते हैं।
- 1ध्यान योग — ध्यान की विधि, मन को वश करना (अभ्यास + वैराग्य), असफल योगी की गति।
- 1ज्ञान विज्ञान योग — ईश्वर का स्वरूप, प्रकृति (अपरा + परा), चार प्रकार के भक्त।
- 1अक्षर ब्रह्म योग — ब्रह्म, अध्यात्म, कर्म, अंतिम समय का स्मरण, देवयान-पितृयान मार्ग।
- 1राजविद्या राजगुह्य योग — सर्वश्रेष्ठ ज्ञान, भगवान सर्वव्यापी, अनन्य भक्ति।
- 1विभूति योग — ईश्वर की विभूतियां (महिमाएं) — सृष्टि में जो-जो श्रेष्ठ है, वह सब मैं हूं।
- 1विश्वरूप दर्शन योग — कृष्ण का विराट (विश्वरूप) दर्शन। समस्त सृष्टि ईश्वर में समाहित।
- 1भक्ति योग — निर्गुण vs सगुण उपासना, भक्त के लक्षण, भक्ति ही सरलतम मार्ग।
- 1क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग — शरीर (क्षेत्र) और आत्मा (क्षेत्रज्ञ) का भेद, प्रकृति-पुरुष विवेचन।
- 1गुणत्रय विभाग योग — तीन गुण (सत्व, रजस्, तमस्) और उनका प्रभाव, गुणातीत स्थिति।
- 1पुरुषोत्तम योग — संसार वृक्ष (अश्वत्थ), क्षर-अक्षर-पुरुषोत्तम, भगवान सबसे परे।
- 1दैवासुर संपद विभाग योग — दैवी और आसुरी गुणों का वर्णन।
- 1श्रद्धात्रय विभाग योग — तीन प्रकार की श्रद्धा (सात्विक, राजसिक, तामसिक), आहार, यज्ञ, तप, दान का विभाजन।
- 1मोक्ष संन्यास योग — समस्त शिक्षाओं का निचोड़, त्याग, वर्णधर्म, 'सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज' (18.66) — गीता का अंतिम और सर्वोच्च उपदेश।





