विस्तृत उत्तर
कीर्तन करने से ऊर्जा में अद्भुत वृद्धि होती है — यह अनुभव करोड़ों भक्तों ने किया है। इसके पीछे शास्त्रीय और वैज्ञानिक दोनों कारण हैं।
शास्त्रीय कारण — कीर्तन 'नाम-संकीर्तन' का रूप है। श्रीमद्भागवत में कहा गया है — 'श्रीकृष्ण-नाम स्वयं भगवान का स्वरूप है।' जब हम भगवान का नाम लेते हैं तो उनकी दिव्य ऊर्जा भक्त के भीतर प्रवाहित होती है। यही कारण है कि घंटों कीर्तन करने के बाद भी भक्त थकते नहीं, बल्कि और उत्साहित होते हैं।
ध्वनि-विज्ञान — कीर्तन में ऊँचे स्वर से नाम लेने से शरीर में कम्पन उत्पन्न होता है। यह कम्पन कोशिकाओं (cells) को सक्रिय करता है। मृदंग, करताल और ऊँचे स्वर की लयबद्ध ध्वनि से हृदय-गति संतुलित होती है और शरीर में प्राण-वायु का संचार बढ़ता है।
श्वास-क्रिया — कीर्तन में लयबद्ध श्वास लेना और छोड़ना होता है। यह अनायास प्राणायाम जैसा प्रभाव डालता है — ऑक्सीजन का संचार बढ़ता है और मस्तिष्क में 'एंडोर्फिन' हार्मोन का स्राव होता है जो उत्साह और आनंद देता है।
सामूहिक ऊर्जा — कीर्तन में सभी एक साथ एक ही नाम लेते हैं। यह सामूहिक चेतना-ऊर्जा का निर्माण करता है जो प्रत्येक प्रतिभागी को ऊर्जान्वित करती है।
चैतन्य महाप्रभु के नाम-संकीर्तन में भाग लेने वाले कभी-कभी 24 घंटे बिना रुके कीर्तन करते रहते थे — यह ईश्वरीय ऊर्जा का प्रत्यक्ष प्रमाण है।





