विस्तृत उत्तर
श्रीरुद्रम अथवा रुद्राभिषेक के मूल पाठ से पूर्व 'लघुन्यास' अत्यंत अनिवार्य वैदिक प्रक्रिया है। 'न्यास' का अर्थ है स्थापन।
लघुन्यास के माध्यम से साधक अपने भौतिक शरीर के विभिन्न अंगों में ब्रह्मांडीय शक्तियों और देवताओं का आवाहन करता है, जिससे उसका शरीर एक दिव्य पात्र (vessel of divine power) बन जाता है।
यह जरूरी है क्योंकि 'न देवो देवमर्चयेत्' — स्वयं देव-तुल्य बने बिना देवता की पूजा नहीं की जा सकती। लघुन्यास के बाद दिग्बंध भी किया जाता है ताकि अनुष्ठान के दौरान कोई नकारात्मक शक्ति बाधा न पहुँचा सके।





