विस्तृत उत्तर
यदि किसी कारणवश (अस्वस्थता, यात्रा या जल का अभाव) पूर्ण शारीरिक स्नान संभव न हो, तो शिव पुराण में 'मंत्र स्नान' का विधान है।
'आपोहिष्ठा' मंत्र की तीन ऋचाओं का पाठ करते हुए जल छिड़का जाता है:
— पहली ऋचा के पाठ पर पैर, मस्तक और हृदय में जल छिड़कें।
— दूसरी ऋचा पर मस्तक, हृदय और पैर पर।
— तीसरी ऋचा पर हृदय, मस्तक और पैर पर जल छिड़क कर स्वयं को पवित्र किया जाता है।
इसके पश्चात पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके कुशा या ऊन के आसन पर बैठकर आचमन किया जाता है। दाहिने हाथ में जल लेकर क्रमशः ॐ केशवाय नमः, ॐ नारायणाय नमः, ॐ माधवाय नमः बोलते हुए तीन बार जल ग्रहण करें और ॐ गोविन्दाय नमः कहकर हाथ धो लें।




