विस्तृत उत्तर
साधक को पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए, शयन हेतु भूमि या कुश के आसन का उपयोग करना चाहिए, और मन में उत्पन्न होने वाले ईर्ष्या, क्रोध, तथा लोभ जैसे विकारों का त्याग करना अनिवार्य है।
शारीरिक शुद्धि के साथ-साथ यह मानसिक तैयारी साधक को अगले दिन के अत्यंत ऊर्जावान खगोलीय संक्रमण को ग्रहण करने के लिए पात्र बनाती है।
कोई भी वैदिक अनुष्ठान केवल बाह्य क्रिया नहीं है, अपितु यह कायिक, वाचिक और मानसिक शुद्धि की एक समग्र प्रक्रिया है।
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