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विस्तृत उत्तर
योग में यम का मतलब तप में प्रवृत्ति और विषय-भोगों से निवृत्ति बताया गया है। यम का प्रथम हेतु अहिंसा कहा गया है। उसके साथ सत्य, अस्तेय यानी चोरी न करना, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह भी यम के आधार बताए गए हैं। पाठ में यह भी कहा गया है कि नियम का मूल भी यही यम है। इसलिए यम योगमार्ग की नैतिक और संयमपूर्ण बुनियाद है।
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शास्त्रीय स्रोत
श्रीलिङ्गमहापुराण, पूर्वभाग, अध्याय 8, PDF पृष्ठ 41-42, श्लोक 10-11
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