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विस्तृत उत्तर
संतोषी व्यक्ति वह कहा गया है जो न्यायपूर्वक अर्जित धन से संतुष्ट रहता है और जो धन चला गया, उसके विषय में चिंता नहीं करता। पाठ में यह संतोष व्रती पुरुष के संदर्भ में बताया गया है। इसी प्रसंग में चान्द्रायण आदि व्रतों का निपुणतापूर्वक आचरण शुभ तप कहा गया है। इसलिए संतोष लोभ से हटकर न्यायपूर्ण जीवन और प्राप्त में संतुष्टि का भाव है।
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शास्त्रीय स्रोत
श्रीलिङ्गमहापुराण, पूर्वभाग, अध्याय 8, PDF पृष्ठ 44, श्लोक 37-38
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