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विस्तृत उत्तर
नाग, कूर्म, कृकल, देवदत्त और धनंजय पाँच उपवायु हैं। डकार आदि के समय क्रियाशील वायु नाग है। उन्मीलन यानी आँख खोलने की अवस्था में क्रियाशील वायु कूर्म है। छींक आदि में आने वाली वायु कृकल है। जम्हाई में क्रियाशील वायु देवदत्त है। महाघोष करने वाली वायु धनंजय है, जो मृत्यु के बाद भी सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त रहती है।
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शास्त्रीय स्रोत
श्रीलिङ्गमहापुराण, पूर्वभाग, अध्याय 8, PDF पृष्ठ 48, श्लोक 63-66
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