विस्तृत उत्तर
योग में शुद्धि का सही अर्थ केवल बाहरी स्नान या सफाई नहीं है। शुचिता दो प्रकार की कही गई है: बाह्य और आभ्यन्तर। इनमें आंतरिक शुचिता श्रेष्ठ है। शिवपूजकों के लिये भस्मस्नान, जलस्नान और मन्त्रस्नान का विधान बताया गया है, पर अंतःशौच के बिना व्यक्ति मलिन ही रहता है। वैराग्यरूपी मिट्टी लगाकर आत्मज्ञानरूपी जल में स्नान करना अन्तःशौच कहा गया है। इसलिए योग में शुद्धि बाह्य से अधिक आंतरिक है।
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