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विस्तृत उत्तर
भ्रान्तिदर्शन वह स्थिति है जिसमें साधक गलत ज्ञान को सही समझ लेता है। पाठ में कहा गया है कि समाधि के समीप पहुँचकर अज्ञान के कारण अनात्म पदार्थों में आत्मज्ञानरूप विपरीत ज्ञान रखना भ्रान्तिदर्शन है। इसका अर्थ है कि जो वस्तु आत्म नहीं है, उसमें आत्म का भाव मान लेना। यह योगाभ्यास की बाधाओं में गिना गया है, क्योंकि यह साधक को सही तत्त्वज्ञान से दूर कर देता है।
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शास्त्रीय स्रोत
श्रीलिङ्गमहापुराण, पूर्वभाग, अध्याय 9, PDF पृष्ठ 52, श्लोक 7
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