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योग बाधाएँ📜 श्रीलिङ्गमहापुराण, पूर्वभाग, अध्याय 9, PDF पृष्ठ 51, श्लोक 5⏱ 1 मिनट पठन

चित्त का लक्ष्य में न ठहरना क्या कहलाता है?

अंतिम अपडेट: 29 मई 2026
संक्षिप्त उत्तर

समाधि अवस्था पाकर भी भवबन्धन के कारण चित्त का लक्ष्य में न ठहरना अनवस्थितचित्तत्व कहलाता है।

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विस्तृत उत्तर

चित्त का लक्ष्य में न ठहरना अनवस्थितचित्तत्व कहलाता है। पाठ में कहा गया है कि समाधि-अवस्था को पाकर भी भवबन्धन के कारण योगी का चित्त लक्ष्य में स्थिर नहीं रह पाता। यही अनवस्थित चित्तत्व है। यह योगाभ्यास का गंभीर विघ्न है, क्योंकि साधक अवस्था के निकट पहुँचकर भी स्थिरता नहीं रख पाता और चित्त फिर बंधन या विचलन की ओर लौट जाता है।

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शास्त्रीय स्रोत
श्रीलिङ्गमहापुराण, पूर्वभाग, अध्याय 9, PDF पृष्ठ 51, श्लोक 5
उत्तर को थोड़ा और स्पष्ट करें

चित्त का लक्ष्य में न ठहरना क्या कहलाता है को संदर्भ सहित समझें

चित्त का लक्ष्य में न ठहरना क्या कहलाता है का सबसे सीधा सार यह है: समाधि अवस्था पाकर भी भवबन्धन के कारण चित्त का लक्ष्य में न ठहरना अनवस्थितचित्तत्व कहलाता है।

योग बाधाएँ जैसे विषयों में यह देखना जरूरी होता है कि बात किस परिस्थिति में लागू होती है, किन नियमों के साथ मान्य होती है और व्यवहार में इसका सही अर्थ क्या निकलता है. उपलब्ध स्रोत श्रीलिङ्गमहापुराण, पूर्वभाग, अध्याय 9, PDF पृष्ठ 51, श्लोक 5 इस दिशा को मजबूत आधार देता है।

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उत्तर का शास्त्रीय आधार देखने के लिए श्रीलिङ्गमहापुराण, पूर्वभाग, अध्याय 9, PDF पृष्ठ 51, श्लोक 5 के उल्लेख को ध्यान से पढ़ें।

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