विस्तृत उत्तर
परमहंस अवस्था आत्मज्ञान, वैराग्य और विवेक की सर्वोच्च अवस्था है। परमहंस वह है जो संसार में रहते हुए भी संसार से लिप्त नहीं होता। वह हंस की तरह सार और असार का भेद जानता है। शरीर, मन, संबंध और विषय उसके लिए अंतिम सत्य नहीं रहते; वह आत्मा को शाश्वत साक्षी रूप में पहचानता है। हंस अवतार इसी परमहंस अवस्था का प्रतीक है। सनकादिक मुनि और अन्य ब्रह्मज्ञानी इसी अवस्था की ओर संकेत करते हैं। परमहंस अवस्था में साधक का मन भगवान या परब्रह्म में स्थिर हो जाता है और माया का प्रभाव टूट जाता है।
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