विस्तृत उत्तर
मत्स्य पुराण (४.७ - ४.१०) स्वयं इस संबंध का दार्शनिक और प्रतीकात्मक उत्तर देता है:
अमूर्तं मूर्तिमद्वापि मिथुनं तत्प्रचक्षते। विरिञ्चिर्यत्र भगवांस्तत्र देवी सरस्वती।।' (मत्स्य पुराण ४.८)
यथा तपो न रहितश्छायया दृश्यते क्वचित्। गायत्री ब्रह्मणः पार्श्वं तथैव न विमुञ्चति।।' (मत्स्य पुराण ४.९)
स्रष्टा और बुद्धि का संबंध: भगवान ब्रह्मा 'निर्माता' (Creator) हैं और देवी सरस्वती 'ज्ञान' (Knowledge) व 'रचनात्मक बुद्धि' (Intellect) का प्रतीक हैं। सृष्टि की रचना बिना ज्ञान के संभव ही नहीं है। जिस प्रकार एक कलाकार अपनी कलाकृति से, या एक कवि अपनी कविता से प्रेम करता है, ब्रह्मा का सरस्वती के प्रति आकर्षण उसी विशुद्ध रचनात्मक ऊर्जा का प्रतीक है।
सूर्य और धूप का दृष्टांत: मत्स्य पुराण स्पष्ट कहता है कि जैसे सूर्य के प्रकाश को सूर्य से अलग नहीं किया जा सकता, वैसे ही गायत्री (सरस्वती) ब्रह्मा का साथ नहीं छोड़ सकतीं। जहाँ ब्रह्मा (स्रष्टा) होंगे, वहाँ सरस्वती (बुद्धि) अनिवार्य रूप से होंगी।
जैविक जन्म का अभाव: सूक्ष्म जगत के देवताओं का शरीर भौतिक (Physical) नहीं होता, वे आत्मास्वरूप हैं। मनु और शतरूपा से पहले मैथुनी (Sexual) सृष्टि अस्तित्व में ही नहीं थी। आधुनिक विज्ञान की भाषा में इसे 'क्लोनिंग' (Cloning) के समान समझा जा सकता है।





