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मंदिर📜 आगम शास्त्र, स्कंद पुराण, विष्णु पुराण, ऋग्वेद2 मिनट पठन

मंदिर में आरती क्यों की जाती है?

संक्षिप्त उत्तर

आरती क्यों: आगम शास्त्र: षोडशोपचार का अनिवार्य चरण। स्कंद पुराण: देवता-मंगल-दर्शन। विष्णु पुराण: ज्योति स्पर्श = ज्ञान-ग्रहण (नेत्र प्रकाशित)। ऋग्वेद: अग्नि = अशुद्धि-नाश। घंटी+शंख+ताल = नाद-ऊर्जा। आरती के बाद हाथ माथे-नेत्रों पर।

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विस्तृत उत्तर

आरती की उत्पत्ति और उसके कारण आगम शास्त्रों और पुराणों में वर्णित हैं।

'आरती' का अर्थ

आरती' = 'आ' (सम्पूर्ण) + 'रती' (रात्रि की पूजा)। या 'आर्ति' = संकट/कष्ट दूर करने वाली। दोनों अर्थ प्रचलित हैं।

शास्त्रीय आधार

आगम शास्त्र: 'नीराजनं नाम दीपैः सह...' — दीप-नीराजन (आरती) = षोडशोपचार का अनिवार्य चरण। इसके बिना पूजा अधूरी।

आरती के पाँच कारण

1पंचोपचार का समापन

आरती = पूजा का समापन-संकेत। इसके बाद भक्त प्रसाद ग्रहण करते हैं।

2देवता का 'मंगल-दर्शन'

स्कंद पुराण: आरती की ज्योति से देवता के सभी अंग प्रकाशित होते हैं — भक्त इसे 'मंगल-दर्शन' कहते हैं। सुबह की आरती = देवता का 'जागृत-दर्शन'।

3ज्ञान-दर्शन

विष्णु पुराण: आरती की ज्योति = ज्ञान की लौ। इसे हाथों से स्पर्श करना = 'इस ज्ञान-ज्योति से मेरे नेत्र प्रकाशित हों।'

4अशुभ-निवारण

ऋग्वेद: अग्नि = पवित्रकर्ता। आरती की ज्योति = अग्नि-स्वरूप = वातावरण की सभी अशुद्धियाँ नष्ट।

5घंटी, शंख, ताल

आरती के साथ घंटी, शंख, ढोलक = सामूहिक नाद-ऊर्जा। यह संयुक्त ऊर्जा देवता को प्रसन्न करती है।

आरती के बाद हाथों से स्पर्श विधि

आरती की लौ को दोनों हाथों से स्पर्श करके माथे और नेत्रों पर लगाएँ — ज्ञान-ज्योति ग्रहण की भावना से।

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शास्त्रीय स्रोत
आगम शास्त्र, स्कंद पुराण, विष्णु पुराण, ऋग्वेद
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