विस्तृत उत्तर
आरती की उत्पत्ति और उसके कारण आगम शास्त्रों और पुराणों में वर्णित हैं।
'आरती' का अर्थ
आरती' = 'आ' (सम्पूर्ण) + 'रती' (रात्रि की पूजा)। या 'आर्ति' = संकट/कष्ट दूर करने वाली। दोनों अर्थ प्रचलित हैं।
शास्त्रीय आधार
आगम शास्त्र: 'नीराजनं नाम दीपैः सह...' — दीप-नीराजन (आरती) = षोडशोपचार का अनिवार्य चरण। इसके बिना पूजा अधूरी।
आरती के पाँच कारण
1पंचोपचार का समापन
आरती = पूजा का समापन-संकेत। इसके बाद भक्त प्रसाद ग्रहण करते हैं।
2देवता का 'मंगल-दर्शन'
स्कंद पुराण: आरती की ज्योति से देवता के सभी अंग प्रकाशित होते हैं — भक्त इसे 'मंगल-दर्शन' कहते हैं। सुबह की आरती = देवता का 'जागृत-दर्शन'।
3ज्ञान-दर्शन
विष्णु पुराण: आरती की ज्योति = ज्ञान की लौ। इसे हाथों से स्पर्श करना = 'इस ज्ञान-ज्योति से मेरे नेत्र प्रकाशित हों।'
4अशुभ-निवारण
ऋग्वेद: अग्नि = पवित्रकर्ता। आरती की ज्योति = अग्नि-स्वरूप = वातावरण की सभी अशुद्धियाँ नष्ट।
5घंटी, शंख, ताल
आरती के साथ घंटी, शंख, ढोलक = सामूहिक नाद-ऊर्जा। यह संयुक्त ऊर्जा देवता को प्रसन्न करती है।
आरती के बाद हाथों से स्पर्श विधि
आरती की लौ को दोनों हाथों से स्पर्श करके माथे और नेत्रों पर लगाएँ — ज्ञान-ज्योति ग्रहण की भावना से।





