विस्तृत उत्तर
मंदिर में दीपक जलाने का महत्त्व वेदों से लेकर पुराणों तक में वर्णित है।
शास्त्रीय आधार
ऋग्वेद (1.97.1): 'अपाम् अग्निम्...' — अग्नि = देवताओं का मुख। दीपक = लघु-अग्नि = देवता के समक्ष अग्नि-साक्षी।
स्कंद पुराण: 'दीपदानेन ज्ञानं भवति।' — दीप-दान से ज्ञान की प्राप्ति होती है।
मंदिर में दीपक के पाँच कारण
1अज्ञान-नाश का प्रतीक
दीपक = प्रकाश = ज्ञान। भगवद्गीता (10.11): 'तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः। नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता।।' — भगवान कहते हैं: 'मैं ज्ञान-दीप से अज्ञान-अंधकार नष्ट करता हूँ।' दीपक जलाना = इसी ज्ञान-ज्योति की प्रार्थना।
2देवता-दर्शन का माध्यम
आगम शास्त्र: मंदिर में दीपक = देवता के सामने प्रकाश। प्राचीन काल में विद्युत न थी — दीपक ही एकमात्र प्रकाश-स्रोत था। इससे मूर्ति का स्पष्ट दर्शन होता था।
3पंच-तत्त्व पूजा
दीपक = अग्नि-तत्त्व की पूजा। षोडशोपचार में दीप = अनिवार्य उपचार।
4आरोग्य और वातावरण-शुद्धि
अग्नि पुराण: घी का दीपक जलाने से वातावरण में व्याप्त जीवाणु नष्ट होते हैं।
5देवता को प्रसन्न करना
स्कंद पुराण: दीप-दान = देवता को प्रकाश अर्पण = अत्यंत पुण्यदायक।





