विस्तृत उत्तर
मंदिर में पुष्प-अर्पण का महत्त्व भगवद्गीता से लेकर आगम शास्त्रों तक में वर्णित है।
शास्त्रीय आधार
भगवद्गीता (9.26): 'पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति।' — पुष्प भगवान को स्वयं स्वीकार्य अर्पण-सामग्री है।
स्कंद पुराण: 'पुष्पेण सह भक्त्या तु हृदयं समर्प्यते।' — पुष्प के साथ भक्त अपना हृदय भी अर्पित करता है।
पुष्प चढ़ाने के कारण
1प्रकृति का सर्वश्रेष्ठ उपहार
फूल = प्रकृति की सर्वाधिक सुंदर रचना। उसे देवता को अर्पित करना = 'आपकी सृष्टि आपको वापस।'
2षोडशोपचार का अनिवार्य अंग
आगम शास्त्र: पुष्प-अर्पण बिना पूजा अधूरी है। यह पाँच अनिवार्य उपचारों (पंचोपचार) में से एक।
3सुगंध = प्राण का अर्पण
पुष्प की सुगंध = प्राण-तत्त्व। देवता को सुगंध अर्पित करना = अपना प्राण-भाव अर्पित करना।
4भाव का प्रतीक
विष्णु पुराण: फूल चढ़ाते समय मन में जो भाव होता है — वही मुख्य है। पुष्प केवल भाव को साकार करने का माध्यम।
5वातावरण-शुद्धि
फूल की सुगंध = नकारात्मक ऊर्जा दूर। मंदिर का वातावरण शुद्ध और सात्विक।
देवता-अनुसार पुष्प
विष्णु — तुलसी, कमल, पीले फूल। शिव — धतूरा, आँकड़ा (तुलसी वर्जित)। दुर्गा — लाल पुष्प। लक्ष्मी — गुलाब, कमल। गणेश — लाल पुष्प, दूर्वा।





