विस्तृत उत्तर
मंदिर में नारियल (श्रीफल) अर्पण का गहरा आध्यात्मिक और प्रतीकात्मक अर्थ शास्त्रों में वर्णित है।
नारियल = श्रीफल (लक्ष्मी का फल)
स्कंद पुराण: नारियल को 'श्रीफल' कहा जाता है — 'श्री' (लक्ष्मी/ऐश्वर्य) का फल। यही कारण है कि यह सभी मांगलिक कार्यों में प्रथम अर्पण होता है।
नारियल के तीन दलों का प्रतीकार्थ
1कठोर बाहरी कवच = अहंकार
आगम शास्त्र: नारियल की कठोर बाहरी परत = मानव का अहंकार। देवता को नारियल अर्पित करना = अहंकार का समर्पण।
2जटाएँ = मानव के विचार/संस्कार
नारियल की जटाएँ = मन में उलझे विचार और पुराने संस्कार। उन्हें देवता को सौंपना = विचारों का समर्पण।
3सफेद गूदा और जल = शुद्ध आत्मा
कवच हटाने पर अंदर का श्वेत गूदा और मीठा जल = शुद्ध आत्मा। यही देवता को समर्पित होती है।
4त्रिनेत्र का प्रतीक
शिव पुराण: नारियल के तीन बिंदु = शिव के तीन नेत्र। शिव को नारियल अर्पित करना = उनके त्रिनेत्र स्वरूप की पूजा।
5पूर्णता का प्रतीक
देवी भागवत: नारियल = पूर्ण फल। अंदर-बाहर दोनों = उपयोगी। सम्पूर्ण समर्पण का प्रतीक।
विधि: नारियल तोड़कर भीतरी भाग देवता को अर्पित करें; बाहरी खोल नहीं।





