विस्तृत उत्तर
मंदिर में मूर्ति की आवश्यकता और उसका शास्त्रीय आधार आगम शास्त्रों और पुराणों में विस्तार से वर्णित है।
मूर्ति = विग्रह (देवता का शरीर)
आगम शास्त्र: मंदिर में स्थापित मूर्ति केवल पत्थर या धातु नहीं है — प्राण-प्रतिष्ठा के बाद उसमें देवता की शक्ति आविष्ट (प्रवेश) होती है। विग्रह = 'वि + ग्रह' = विशेष रूप से ग्रहण किया हुआ (देवता का निवास)।
मूर्ति पूजा के कारण
1निर्गुण को सगुण में जानना
भागवत पुराण (2.3.22): 'शास्त्रोक्त विग्रहे यस्तु...' — शास्त्र-विधि से निर्मित विग्रह में परमात्मा का ध्यान करना = निर्गुण-ब्रह्म को सगुण माध्यम से जानना। यह साधारण जीव के लिए अनिवार्य है।
2. नारद भक्ति सूत्र (54): 'मूर्तिपूजा हि लोकस्य आवश्यकी।' — सामान्य मनुष्य के लिए मूर्ति-पूजा आवश्यक है क्योंकि निर्गुण-उपासना कठिन है।
2संकेन्द्रण का माध्यम
मूर्ति की विशिष्ट आकृति = एक स्थान पर सभी भक्तों का ध्यान-संकेन्द्रण। समूह-ऊर्जा का निर्माण।
3प्राण-प्रतिष्ठा
आगम शास्त्र: वेदमंत्रों के साथ प्राण-प्रतिष्ठा = देवता-शक्ति का विग्रह में आह्वान। इसके बाद विग्रह में साधारण पत्थर-धातु नहीं रहती।
4परंपरा का संरक्षण
विष्णु पुराण: विशिष्ट देवता के विशिष्ट रूप-रंग-आयुध = शास्त्र-ज्ञान का जीवंत संग्रहालय।





