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मंदिर📜 वाल्मीकि रामायण (बालकाण्ड), मनुस्मृति, आगम शास्त्र, स्कंद पुराण2 मिनट पठन

मंदिर में जूते क्यों उतारे जाते हैं?

संक्षिप्त उत्तर

जूते क्यों उतारें: आगम शास्त्र — मंदिर = देव-भूमि, जूते = बाहरी अशुद्धि। स्कंद पुराण: जूते = अहंकार प्रतीक, उतारना = विनम्रता। नंगे पैर = पृथ्वी-तत्त्व से ऊर्जा। मनुस्मृति: भौतिक शुद्धि। मन में 'सांसारिक से पवित्र' संक्रमण का संकेत।

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विस्तृत उत्तर

मंदिर में जूते उतारने का विधान शास्त्रों में पवित्रता और विनम्रता दोनों के संदर्भ में वर्णित है।

शास्त्रीय प्रमाण

वाल्मीकि रामायण (बालकाण्ड): जब राम वनवास जाने लगे, भरत ने उनके खड़ाऊँ (पादुका) ले लिए और उन्हें राज-सिंहासन पर रखकर प्रणाम किया। यह प्रसंग जूते = अहंकार का प्रतीक है।

जूते उतारने के पाँच कारण

1मंदिर = देव-भूमि

आगम शास्त्र: मंदिर-परिसर देवता का निवास-स्थान है — देव-भूमि। जूते-चप्पल = बाहर की अशुद्धि का वाहक। इस अशुद्धि को देव-भूमि में नहीं ले जाना।

2पृथ्वी-स्पर्श — ऊर्जा-प्राप्ति

मंदिर में नंगे पैर चलने पर पृथ्वी-तत्त्व से सीधा संबंध। मंदिर की भूमि = ऊर्जा-संचित।

3विनम्रता

स्कंद पुराण: जूते-चप्पल = अहंकार का प्रतीक। उन्हें उतारना = अहंकार उतारना। देवता के समक्ष विनम्र होना।

4मानसिक संक्रमण (transition)

जूते उतारना एक संकेत है कि 'मैं सांसारिक क्षेत्र से पवित्र क्षेत्र में प्रवेश कर रहा/रही हूँ।' यह मन को पूजा के लिए तैयार करता है।

5व्यावहारिक शुद्धि

मनुस्मृति: जूते बाहरी अशुद्धि (धूल, मल-मूत्र आदि) लाते हैं। उन्हें मंदिर के बाहर छोड़ना = भौतिक शुद्धि।

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शास्त्रीय स्रोत
वाल्मीकि रामायण (बालकाण्ड), मनुस्मृति, आगम शास्त्र, स्कंद पुराण
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