विस्तृत उत्तर
मंदिर में जूते उतारने का विधान शास्त्रों में पवित्रता और विनम्रता दोनों के संदर्भ में वर्णित है।
शास्त्रीय प्रमाण
वाल्मीकि रामायण (बालकाण्ड): जब राम वनवास जाने लगे, भरत ने उनके खड़ाऊँ (पादुका) ले लिए और उन्हें राज-सिंहासन पर रखकर प्रणाम किया। यह प्रसंग जूते = अहंकार का प्रतीक है।
जूते उतारने के पाँच कारण
1मंदिर = देव-भूमि
आगम शास्त्र: मंदिर-परिसर देवता का निवास-स्थान है — देव-भूमि। जूते-चप्पल = बाहर की अशुद्धि का वाहक। इस अशुद्धि को देव-भूमि में नहीं ले जाना।
2पृथ्वी-स्पर्श — ऊर्जा-प्राप्ति
मंदिर में नंगे पैर चलने पर पृथ्वी-तत्त्व से सीधा संबंध। मंदिर की भूमि = ऊर्जा-संचित।
3विनम्रता
स्कंद पुराण: जूते-चप्पल = अहंकार का प्रतीक। उन्हें उतारना = अहंकार उतारना। देवता के समक्ष विनम्र होना।
4मानसिक संक्रमण (transition)
जूते उतारना एक संकेत है कि 'मैं सांसारिक क्षेत्र से पवित्र क्षेत्र में प्रवेश कर रहा/रही हूँ।' यह मन को पूजा के लिए तैयार करता है।
5व्यावहारिक शुद्धि
मनुस्मृति: जूते बाहरी अशुद्धि (धूल, मल-मूत्र आदि) लाते हैं। उन्हें मंदिर के बाहर छोड़ना = भौतिक शुद्धि।





