विस्तृत उत्तर
प्रसाद की अवधारणा और उसके दान का कारण भागवत पुराण और भगवद्गीता में विस्तार से वर्णित है।
'प्रसाद' का अर्थ
प्रसाद = प्रसन्नता + आनंद + कृपा। देवता को अर्पित वस्तु जब उनकी कृपा-दृष्टि से आशीर्वादित होकर भक्त को वापस मिलती है — वही प्रसाद है।
शास्त्रीय आधार
भगवद्गीता (9.26): 'पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति। तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः।।' — भगवान कहते हैं: 'मैं भक्ति से अर्पित पत्र, पुष्प, फल, जल को ग्रहण करता हूँ।' देवता द्वारा 'ग्रहण' किया गया = प्रसाद।
भागवत पुराण (11.27.17): देवता को अर्पित वस्तु में देवता की शक्ति समाहित होती है। वह भक्त को वापस मिलती है — यही देवता का 'प्रसाद' (अनुग्रह) है।
प्रसाद देने के कारण
1देवता-अनुग्रह का प्रतीक
प्रसाद = देवता की कृपा का साकार रूप। ग्रहण करने वाले पर देवता की दृष्टि पड़ती है।
2समत्व-भाव
आगम शास्त्र: मंदिर में सभी को एक समान प्रसाद = समाज में समता का संदेश। भेद-भाव मिटाने का माध्यम।
3भोजन का पवित्रीकरण
विष्णु पुराण: देवता को अर्पित अन्न = 'विष्णु-अन्न'। यह शरीर और मन दोनों को पवित्र करता है।
4कृतज्ञता-भाव
प्रसाद ग्रहण करना = देवता के प्रति कृतज्ञता का प्रकटन — 'आपने स्वीकार किया, अब मुझे दे रहे हैं।'





