विस्तृत उत्तर
मंदिर में प्रणाम करने की विधि और उसके कारण शास्त्रों में विस्तार से वर्णित हैं।
प्रणाम के प्रकार
1नमस्कार (हस्त-जोड़)
दोनों हाथ जोड़कर हृदय के समक्ष रखना = 'नमः' (मैं समर्पित हूँ)।
2पंचांग प्रणाम
दोनों घुटने, दोनों हाथ और मस्तक — पाँच अंगों से प्रणाम।
3साष्टांग प्रणाम
आगम शास्त्र: आठ अंगों (द्विपाद, द्विजानु, द्विकर, उरस्, शिरस्, दृष्टि, मन, वाक्) से भूमि पर लेटकर प्रणाम। यह सर्वोच्च समर्पण।
सिर झुकाने के कारण
4अहंकार-विसर्जन
भागवत पुराण: मस्तक = अहंकार का केंद्र। मस्तक झुकाना = 'मेरा अहंकार आपके चरणों में।' यह पूजा का सार है।
5देवता-ऊर्जा का ग्रहण
आगम शास्त्र: सिर झुकाने पर आज्ञाचक्र (भौहों के बीच) देवता की ओर होता है — देवता की ऊर्जा इस बिंदु से प्रवेश करती है। इसीलिए माथे पर तिलक लगाया जाता है।
6विनम्रता और श्रद्धा
मनुस्मृति: 'प्रणामः पापनाशनः।' — प्रणाम से पाप नष्ट होते हैं। विनम्र व्यक्ति को देवता की कृपा शीघ्र मिलती है।
7चरण-स्पर्श
विष्णु स्मृति: देवता के चरण = संसार की जड़। चरण-स्पर्श = सबसे गहरे समर्पण का भाव।
8शारीरिक लाभ
साष्टांग प्रणाम = सम्पूर्ण शरीर का व्यायाम। मस्तक को भूमि लगाना = रक्त-संचार सुधरता है।





