विस्तृत उत्तर
जप में आँखें बंद या खुली — इस पर शास्त्रों में दोनों का महत्व बताया गया है:
आँखें बंद — श्रेष्ठ (अधिकांश जप में)
- 1प्रत्याहार: पातंजल योग — 'इंद्रियों को बाहर से खींचकर भीतर लाना।' आँखें बंद = दृष्टि इंद्री का निग्रह।
- 2आंतरिक दर्शन: आँखें बंद होने पर मन में इष्ट देव का स्वरूप स्पष्ट दिखता है।
- 3एकाग्रता: बाहरी दृश्यों का विक्षेप नहीं।
आँखें खुली — कब उचित
- 1त्राटक जप: मूर्ति को एकाग्रता से देखते हुए जप — यह 'खुली आँख' का ध्यान है।
- 2ऊँघ आए: यदि आँखें बंद करने पर नींद आए — आधी खुली या पूरी खुली रखें।
- 3प्रारंभिक साधक: मूर्ति देखते हुए जप करना — ध्यान बनाए रखने में सहायक।
भगवद् गीता (6.13)
नासिकाग्रे दृष्टिम् अवस्थाप्य' — नाक की नोक पर दृष्टि (आधी बंद)। यह मध्यम मार्ग है।
मंत्र महोदधि का मत
जप में मुख्य है — मन का इष्ट देव पर होना। आँखें बंद-खुली से अधिक महत्वपूर्ण है मन की स्थिति।
सर्वोत्तम
आँखें बंद → इष्ट देव का आंतरिक दर्शन → जप।





