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जप विधि⏱ 3 मिनट पठन

मंत्र जप की सही विधि क्या है?

मंत्र जप से पूर्व स्नान, शांत स्थान, कुश आसन, पूर्व मुख, संकल्प और गुरु स्मरण करें।

संक्षिप्त उत्तर

मंत्र जप से पूर्व स्नान, शांत स्थान, कुश आसन, पूर्व मुख, संकल्प और गुरु स्मरण करें। माला को अनामिका और अंगूठे से पकड़ें, तर्जनी न लगाएं। मानसिक जप सर्वोत्तम है। जप के बाद माला सिर से लगाकर देवता को अर्पित करें।

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विस्तृत उत्तर

मंत्र जप की विधि वेद, तंत्र और योग शास्त्र में विस्तार से वर्णित है। सही विधि से किया गया जप ही फलदायी होता है:

जप से पूर्व षटकर्म (छः तैयारियाँ)

1शौच और स्नान (शरीर शुद्धि)

प्रातःकाल नित्यकर्म के बाद स्नान करें। स्नान शरीर और मन — दोनों को शुद्ध करता है।

2देश (स्थान शुद्धि)

स्वच्छ, शांत और पवित्र स्थान चुनें। पूजा कक्ष, मंदिर या एकांत स्थान श्रेष्ठ है।

3काल (समय)

ब्रह्ममुहूर्त (प्रातः 4-6) या सायंकाल (संध्या) सर्वश्रेष्ठ। नित्य एक ही समय जप करें।

4आसन (बैठने की विधि)

कुश, ऊनी या सूती आसन पर बैठें। भूमि पर सीधे न बैठें।

5दिशा

पूर्व मुख (सामान्य जप) या उत्तर मुख (देवी साधना) श्रेष्ठ है। दक्षिण मुख पितृ कार्य के लिए।

6संकल्प

जप का उद्देश्य मन में स्पष्ट करें और हाथ में जल लेकर बोलें।

जप की क्रमिक विधि

चरण 1 — देवता का ध्यान

आँखें बंद करके अपने इष्टदेव का स्पष्ट रूप मन में बनाएं। ध्यान दृढ़ होने पर ही जप आरंभ करें।

चरण 2 — प्राणायाम

तीन बार गहरी साँस लें। मन को स्थिर करें।

चरण 3 — गुरु स्मरण

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः...' या अपने गुरु का स्मरण करें।

चरण 4 — माला जप

  • ▸माला को दाहिने हाथ की अनामिका और अंगूठे से पकड़ें
  • ▸तर्जनी (index finger) माला से अलग रखें
  • ▸सुमेरु (मुख्य मनका) को कभी न लांघें — माला पलटें
  • ▸प्रत्येक मनके पर एक मंत्र जपें

चरण 5 — मंत्र उच्चारण

तीन प्रकार का जप:

  • ▸वाचिक जप — मुख से स्पष्ट बोलना (न्यूनतम फल)
  • ▸उपांशु जप — होंठ हिलाएं, आवाज न हो (मध्यम फल)
  • ▸मानसिक जप — केवल मन में (सर्वोत्तम फल)

जप पूर्णता

  • ▸माला पूर्ण होने पर माला सिर से लगाएं
  • ▸देवता को जप समर्पित करें: 'अस्य जपस्य फलं श्री [देवता] अर्पणमस्तु'

जप के बाद

  • ▸थोड़ी देर मौन में बैठें
  • ▸प्रसाद ग्रहण करें
  • ▸मंत्र और माला की गोपनीयता रखें

तीन प्रकार के जप (कुलार्णव तंत्र से)

  • ▸नित्य जप: प्रतिदिन नियमित — फल: पाप नाश, मनोशांति
  • ▸नैमित्तिक जप: विशेष अवसर पर — फल: कामना पूर्ति
  • ▸काम्य जप: किसी इच्छा हेतु — फल: मनोकामना सिद्धि
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