विस्तृत उत्तर
नवधा भक्ति के नौ प्रकारों में से सबसे सरल कौन सी है — इस पर शास्त्र और आचार्यों में कुछ भिन्न मत हैं।
भक्त प्रह्लाद के वचन के अनुसार — श्रीमद्भागवत में प्रह्लाद ने नौ भक्तियों में श्रवण, कीर्तन और स्मरण को श्रेष्ठ बताया और इन तीनों में श्रवण को सर्वश्रेष्ठ कहा। कारण यह है कि श्रवण में व्यक्ति को कुछ विशेष करना नहीं — केवल भगवान की कथा, नाम और गुणों को ध्यान से सुनना है। यह सबसे निष्प्रयास भक्ति है।
कलियुग के संदर्भ में — श्रीमद्भागवत (12.3.51-52) के आधार पर और बृहन्नारदीय पुराण के 'हरेर्नाम हरेर्नाम हरेर्नामैव केवलम्' वचन के आधार पर कहा जाता है कि कलियुग में नाम-संकीर्तन (कीर्तन) सबसे सुलभ और शीघ्रफलदायी भक्ति है। इसके लिए न विशेष शुद्धता चाहिए, न देश-काल का बंधन।
रामचरितमानस के अनुसार — श्रीराम ने शबरी को जो नवधा भक्ति बताई उसमें सत्संग (संतों का संग) को प्रथम और सबसे सरल कहा। कारण यह है कि संत-संगति में भक्ति का भाव स्वाभाविक रूप से जागता है।
संत-परंपरा और तुलसीदास जी मानते हैं कि नाम-जप सबसे सरल भक्ति है क्योंकि यह सर्वत्र, सर्वकाल और सभी के लिए सुलभ है — चलते, बैठते, सोते, जागते — कभी भी किया जा सकता है।
सार यह है — जो भक्ति आपके स्वभाव और परिस्थिति के अनुसार सहज हो, वही आपके लिए सबसे सरल है।





