विस्तृत उत्तर
प्रार्थना में क्या बोलें — इसका कोई कठोर नियम नहीं है। भगवान भाषा नहीं, भाव देखते हैं। तुलसीदास जी ने लिखा — 'भावहि भाव जानत है साईं।'
प्रार्थना की सामान्य संरचना —
1. स्तुति (Praise) — पहले भगवान के गुण, महिमा और कृपा का स्मरण करें। 'हे प्रभु, आप सर्वशक्तिमान, करुणासागर, सर्वव्यापी हैं।'
2. कृतज्ञता (Gratitude) — जो मिला है उसके लिए धन्यवाद। 'आपने मुझे यह जीवन, परिवार और स्वास्थ्य दिया, इसके लिए कृतज्ञ हूँ।'
3. पश्चाताप (Confession) — अपनी गलतियाँ, कमजोरियाँ स्वीकार करें। 'मुझसे अनजाने में जो पाप हुए, उन्हें क्षमा करें।'
4. याचना (Request) — अपनी वास्तविक आवश्यकता बोलें — परंतु सदा 'आपकी इच्छा सर्वोपरि है' के भाव के साथ। 'मुझे सत्य-बुद्धि दें, भक्ति दें, मेरे परिवार की रक्षा करें।'
5. समर्पण (Surrender) — प्रार्थना का अंत समर्पण से करें। 'सब आप पर छोड़ता हूँ। आपकी जो इच्छा।'
कैसे बोलें — मन में भी, वाणी से भी। एकांत में जोर से बोलना अधिक प्रभावशाली है — क्योंकि श्रवण-इंद्रिय भी सक्रिय होती है। मातृभाषा में बोलें — भगवान सभी भाषाएं समझते हैं।
विशेष अवसरों पर वेद-मंत्र, चालीसा, स्तोत्र का पाठ भी प्रार्थना का उत्तम रूप है।





