विस्तृत उत्तर
शिव स्वयं कहते हैं — 'अहं शिवः शिवास्यायं त्वं चापि शिव एव हि। सर्व शिवमयं ब्रह्म शिवात पर न किंचन।' अर्थात् 'मैं शिव हूँ, तुम शिव हो, सभी कुछ शिवमय है। शिव के अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं है।'
अष्टमूर्ति का यह महान सिद्धांत यह सिद्ध करता है कि संपूर्ण प्रकृति — पंचभूत, सूर्य, चंद्र और यहाँ तक कि उपासना करने वाला जीव (यजमान) — स्वयं शिव का ही साक्षात विस्तार है।
यह अध्ययन का उद्देश्य शिव के उस गूढ़ रहस्य को उद्घाटित करना है, जहाँ पौराणिक कथाएं आध्यात्मिक रूपकों में परिवर्तित हो जाती हैं और जीव को 'सोऽहं' (मैं ही शिव हूँ) के अद्वैत ज्ञान की ओर ले जाती हैं।





