विस्तृत उत्तर
स्कंद पुराण के काशी खण्ड (अध्याय ५३) में महोदरेश्वर शिवलिंग की फल-श्रुति का अत्यंत स्पष्ट उद्घोष किया गया है। महर्षि अगस्त्य को कथा सुनाते हुए स्कंद देव स्पष्ट करते हैं कि जो साधक पूर्ण श्रद्धा के साथ काशी में महोदरेश्वर शिवलिंग के दर्शन और शास्त्रसम्मत साधना करता है, उसे 'सायुज्य मुक्ति' प्राप्त होती है।
इसका शाब्दिक और दार्शनिक अर्थ यह है कि जीवनकाल में लोभ और भोगासक्ति का त्याग करने वाले साधक को मृत्यु के पश्चात पुनः किसी "माता के उदर (गर्भ) की गुहा में प्रवेश नहीं करना पड़ता" (one never enters the cavity of a mother's belly)। वह जन्म और मरण के इस अंतहीन और पीड़ादायक चक्र से सर्वदा के लिए मुक्त होकर शिव-तत्त्व में विलीन हो जाता है।





